दरिंदगी: लड़की को उठाकर जाने कहां ले गए नेपाली मजदूर

देहरादून। बिहार के मोतीहारी जिले के रामाशीष कुमार घर जाने के लिए ट्रेन में सवार तो हुए, लेकिन थोड़ा सा कुरेदने पर उनकी पीड़ा आंसू बहकर निकल पड़ी। रामाशीष ने बताया कि हम 22 लोग केदारनाथ के दर्शनों को निकले थे। इनमें हमारे बाबूजी विपिन चौधरी भी शामिल थे, लेकिन कोई भी रामबाड़ा से आगे नहीं जा पाया। 17 जून को रामबाड़ा में आई बाढ़ कई जिंदगियां लील गई। किसी को कुछ पता नहीं चल रहा था। बदहवासी की हालत में जंगलों की ओर भागकर जान बचाई। यह भी नहीं पता चला कि पिताजी व अन्य लोग कहां गए। जंगलों में जो तीन दिन गुजार वे मौत से भी बदतर थे।

रामाशीष कुमार ने बताया कि हमारे बाबूजी पहली बार केदार बाबा के दर्शनों को आए थे। बाबा के दर्शन भी नहीं हुए और बाबूजी का भी कुछ पता नहीं। रामाशीष बताते हैं कि जंगल में जिन लोगों ने शरण ली थी उनको नेपाली मूल के कुछ लोगों ने अमानवीयता की हद तक लूटा। रास्ता बताने के बहाने हमें जंगल में कैद करके रखा। पहले तो उन्होंने पैसे मांगे और विरोध करने पर जमकर पीटा, फिर कपड़ों से लेकर महिलाओं के जेवर आदि सब छीन लिए। महाराष्ट्र की एक लड़की को तो उठाकर वे जाने कहां ले गए। यह देख उसकी मां बदहवास सी हो गई। जाने क्या किया होगा, उसके साथ। उसका अब भी कहीं अता-पता नहीं है। हेलीकॉप्टर से पैकेट गिरते थे तो उसे भी छीन लेते थे। यहां तक कि उन्होंने हमें पीने तक को पानी भी नहीं दिया। गंदा पानी पीकर जिंदा रहे। सब कुछ छीनकर जब वे लोग निकल गए तो जान में जान आई। किसी तरह पेड़ के सहारे नदी पार कर पैदल 21 जून को गौरीकुंड पहुंचे। वहां से सेना की मदद से गुप्तकाशी पहुंचाया गया। वहां पता चला कि हमारे साथ के कुछ लोगों को भी बचाया गया है, लेकिन इनमें पिताजी नहीं हैं।

रामाशीष कुमार के मुताबिक रामबाड़ा में आई प्रलय में लापता हुए हमारे 11 लोगों में बाबूजी, चचेरा भाई व दोस्त भी शामिल हैं। जेब में पैसा भी नहीं है। अकेले घर जा रहे हैं। अम्मा को फोन पर बताया तो वह कह रही थीं कि भगवान पर भरोसा रख, पर उम्मीद जैसे समाप्त होती जा रही है।

NO COMMENTS

Leave a Reply