विचारों को हिंसा से न काटिए

 

Govind Pansare                     Narendra Dabholkar                   M.M. Kalburgi                   

 

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20 Feb 2015                                 20 Aug 2013                                30 Aug 2015    

 

 

 

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मुकेश  नौटियाल

जो लोग तर्कस्त्रियों पर हमले कर रहे हैं उनको न तो हिन्दू-धर्म की परम्पराओं का ज्ञान है, न ही भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति की समझ है। ये वही ठस्स-बुद्धि वाले लोग है जो एम.एफ.
हुसैन जैसे पेंटर को देवताओं के नग्न चित्रण के आरोप में देष छोड़ने पर मजबूर करते हैं जबकि उनकी अपनी परम्परा में ‘कामसूत्र’ जैसे षास्त्र और अजंता-एलोरा जैसी कलाकृतियां मौजूद है।

उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी (हिन्दी), शशि देशपाण्डे,
साराजोसेफ, नयनतारा सहगल (अंग्रेजी), रहमान अब्बास, अमन सेठी (उर्दू), के. सच्चिदानंदन और पी.के.
परक्कादवु (मलियालम), डाॅ. अरविन्द मालागत्ती, के.वीरभदपा (कन्नड़), गुरूवचन भुल्लर, अजमेर सिंह औलख, मेघराज मित्तर, आत्मजीत सिंह (पंजाबी), गणेश देवी (गुजराती) जैसे कुछ नाम हैं जिन्होंने इन दिनों साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया है, अथवा अकादमियों की समितियों से इस्तीफा दे दिया है। संभव है कि इन पंक्तियों के छपने तक यह लिस्ट लम्बी हो जाए और कई अन्य साहित्यकार भी अपना पुरस्कार लौटा दें लेखकों, कवियों और साहित्यकारों को हमने अकादमी सम्मान और पद्म पुरस्कार हथियाने के लिए कसरत करते तो सुना था लेकिन यह पहली बार है कि सम्मान लौटाने वालों में होड़ लगी है। इन प्रबुद्ध रचनाधर्मियों का आरोप है कि केन्द्र में संघनिष्ठ सरकार आते ही दक्षिणपंथी सक्रिय हो गए हैं और स्वतंत्र विचार रखने वालों की या तो हत्याएं की जा रही हैं या उनको धमकियां दी जा रही है।बीते दिनों कुछ घटनाएं हुई जिनसे वातावरण ऐसा बना कि समाज के एक हिस्से में असुरक्षा की भावना व्याप्त हो गई। ऐसी घटनाएं पहले भी होती थीं लेकिन तब व्यावसायिक मीडिया उनका संज्ञान इस फाॅर्मेट में नहीं लेता था। अंध विश्वासों की मुखालफत करने वाले नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या की गई। फिर तर्कशास्त्री गोविंद पानसेरे मारे गए। कन्नड़ लेखक और नेशनालिस्ट एम.एम. कलबुर्गी की जघन्य हत्या के बाद यह बात सिद्ध-सी हो गई कि सचमुच कुछ शक्तियां सक्रिय हो गई हैं जो विरोधी विचारों के उद्गम पर ही हमला करना चाहती है। अभी प्रबुद्ध समाज पर हमले हो ही रहे थे कि दिल्ली से सटे दादरी गांव में अकलाख नाम के मुस्लिम को केवल इस शंका में पीट-पीट कर मार दिया गया कि उसने गोमांस-भक्षण किया था।

इन तमाम घटनाओं की पृष्ठभूमि में सरकार विरोधी तमाम शक्तियों ने मांग की कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन पर अपना मत व्यक्त करें। आश्चर्यजनक रूप से प्रधानमंत्री चुप रहे जबकि सोशल मीडिया के मार्फत कई बार सामान्य घटना पर भी वह ट्वीट कर अपनी राय जाहिर करते है। एक तरफ प्रधानमंत्री की चुप्पी, दूसरी तरफ संघ और सचमुच कहीं कुछ फायर-ब्राण्ड नेताओं के बयान से ऐसा लगा जैसे सचमुच कहीं कुछ शुरूआत हो रही है। प्रधानमंत्री का बयान आया भी तो तब जब राष्ट्रपति ने अपनी बात कहकर सत्ता-प्रतिष्ठान को राजधर्म की याद दिलाई, हो सकता है कि इस समूची कवायद से बिहार चुनावों में ध्रुवीकरण हो और गाय का मुद्दा कुछ लोगों की तकदीर बदल दे, लेकिन वृहद दृष्टिकोण से देखा जाए तो इन घटनाओं ने भारत के आजाद और शांतिप्रिय राष्ट्र की छवि को धूमिल ही किया है। सनातन हिन्दू संस्कृति की इस धारा में स्वतंत्र विचारों का हमेशा स्वागत किया गया है। बौद्ध, जैन और सिख धर्मों की धाराएं यूं ही नहीं फूटी, सनातन संस्कृति में बहस की जगह हमेशा बनी रही है। ऐसे में, तर्कशास्त्री भले ब्राह्मणों और सामंतों द्वारा धर्म के नाम पर इजाद की गई मीमांसाओं को खारिज करें परन्तु संस्कृति की मूल
धारा को खारिज करने के लिए उनको भी ना तर्क गढ़ने पडे़गे। ऐसे में अगर कोई समझता है कि सवाल पूछने या बहस करने से सनातन- संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी तो उससे ज्यादा मतिमंद कोई दूसरा नही हो सकता ऐसे लोगों को यह जानना जरूरी है कि हिन्दू-धर्म की आदि धारा में शास्त्रार्थ करने की परम्परा रही है- लकीर पीटने की नही। जो लोग तर्कशास्त्रियों पर हमले कर रहे हैं उनको न तो हिन्दू-धर्म की परम्पराओं का ज्ञान है, न ही भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति की समझ है। ये वही ठस्स-बुद्धि वाले लोग है जो एम.एफ. हुसैन जैसे पेंटर को देवताओं के नग्न चित्रण के आरोप में देश छोड़ने पर मजबूर करते हैं जबकि उनकी अपनी परम्परा में ‘कामसूत्र’ जैसे शास्त्र और अजंता-एलोरा जैसी कलाकृतियां मौजूद है।
दादरी की घटना भी एक समुदाय को भयभीत करने की कवायद लगती है, ऐसी घटनाओं से यहां समाजिक समरसता का ताना-बाना नष्ट होता है। वहीं मुस्लिमों के साथ कथित बड़बोले नेताओं को भी समाज में वितृष्णा फैलाने का अवसर मिलता है। प्रधानमंत्री की इस बात में दम है कि हिन्दू-मुस्लिम आपस में लड़ने के बजाय गरीबी से लड़ें- लेकिन अपने मंसूबों को विश्वसनीय साबित करने के लिए उनको सबसे पहले अपने समधर्मी साथियों की जुबान पर लगाम लगानी होगी। इन दिनों उनकी पार्टी के लोग जिस तरह के बयान दे रहे हैं उनसे स्थितियां बदतर ही होने वाली है। हद तो तब होती है जब सरकार में शामिल मंत्रीगण ही मर्यादाओं को भूलकर परोक्ष रूप से उन लोगों के पक्ष में खडे़ होते प्रतीत होते हैं जिन पर वैमनस्यता को बढ़ावा देने के आरोप होते है। यह एक खतरनाक स्थिति है। साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले बौद्धिक समाज के लोगों के विरोध को सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। आजाद भारत के इतिहास में अगर यह पहली बार हो रहा है तो समझा जा सकता है कि आसन्न खतरों की शुरूआती चमक मिलने लगी है। अच्छा हो अगर समय रहते चीजों को संभालने और सहेजने की शुरूआत की जाए। सम्पूर्ण क्रांति के नायक जयप्रकाश नारायण की 113 वीं जयंती पर शानदार भाषण देने और आपातकाल में जेल गए जांबाजों को सम्मानित करने के बावजूद प्रधानमंत्री की तरफ से अभी ऐसे उपाय करने शेष हैं जिनसे राष्ट्र के नागरिकों को यह भरोसा हो कि देश इंटिलेक्चुअल इमर्जेंसी की तरफ नहीं जा रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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