पानी का अनुपम पहरुआ!

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रमेश कुमार

अनुपम मिश्र को समाज के लोग बड़े आदर व सम्मान की दृष्टि से देखते थे। उनका सीधा-सादा जीवन और सच्चाई एवं साफगोई उनकी पहचान थी। देश के खत्म हो रहे तालाबों के लिये वे भागीरथ साबित हुए। हिन्दी के प्रख्यात जनकवि भवानी प्रसाद मिश्र के घर जन्मे अनुपम मिश्र, राजनीति, सिनेमा समाज सेवा और अन्य कई जगहों पर दिखाई पड़ने वाली या थोपी जाने वाली वंश परम्परा से बिल्कुल अलग जीवट के आदमी निकले। अपने पिता के साहित्य प्रेम से वे पता नहीं कितने प्रभावित थे, मगर पिता के गाँधीवाद ने उनको जीवन का सच्चा मार्ग दिखाया।

सन 1948 में महाराष्ट्र के वर्धा जिले में अनुपम मिश्र का जन्म पिता भवानी प्रसाद मिश्र एवं माता सरला मिश्र के यहाँ तीसरे पुत्र के रूप में हुआ। सन 1969 में अपनी कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद श्री मिश्र दिल्ली के गाँधी पीस फाउंडेशन में काम करने लगे। जब गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान से जुड़े तो एम.ए. कर चुके थे। लेकिन यह डिग्री वाली शिक्षा किस काम की जब अनुपम मिश्र की समझ ज्ञान के उच्चतम धरातल पर विकसित होती हो। अपने एक लेख पर्यावरण के पाठ में वे लिखते हैं लिखत-पढ़तवाली सब चीजें औपचारिक होती हैं। सब कक्षा में, स्कूल में बैठकर नहीं होता है। इतने बड़े समाज का संचालन करने, उसे सिखाने के लिये कुछ और ही करना होता है। कुछ तो रात को माँ की गोदी में सोते-सोते समझ में आता है तो कुछ काका, दादा, के कन्धों पर बैठ चलते-चलते समझ में आता है। यह उसी ढंग का काम है-जीवन शिक्षा का।

भले ही नौकरी दिल्ली में कर रहे थे लेकिन सेवा देश के कई हिस्सों का करते थे, खासतौर पर मध्य प्रदेश और राजस्थान की ज्यादा। सत्तर के दशक में जब आजार्य विनोबा भावे ने चम्बल के डाकुओं से बीहड़ का रास्ता त्याग देने का आह्वान किया था, तब उन्होंने इस बात की प्रेरणा दी थी कि डाकू बुराई का रास्ता अपने अन्तरात्मा की आवाज पर छोड़ें। वे सरकार पर माफी, सजा से बचाव, जमीन-जायदाद, मुआवजा और खेती जैसी सौदेबाजी के बजाय अपने जीवन को आने वाली पीढ़ियों और समाज के लिये तब्दील करें। अनुपम मिश्र के अनुसार, उस वक्त प्रभाष जोशी, मैं और श्रवण गर्ग इस अनुष्ठान में तमाम जोखिमों के साथ 1972  चम्बल के बीहड़ों में काम करने गए थे। उस समय चम्बल की बन्दूकें गाँधी के चरणों में, अभियान चलाया। जयप्रकाश नारायण ने जो पौधा रोपा उसमें विनम्रतापूर्वक पानी देने का काम अनुपम मिश्र, प्रभाष जोशी एवं श्रवण गर्ग ने किया और उसका फल 548 बागियों के समर्पण के रूप में प्राप्त हुआ।

अनुपम मिश्र, प्रजानीति और इण्डियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों में थोड़े-थोड़े समय काम करने के बाद गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में साढ़े तीन सौ रुपए माहवार की प्रूप रीडिंग की नौकरी से शुरुआत की। शरीर पर खादी का कपड़ा एवं पैरों में टायर का चप्पल उनके सादगी भरे जीवन को जीता-जागता सबूत था। उनका पूरा जीवन जैसा था, वैसा का वैसा उनके लिखे हुए में दिखता था। जीवन को कम आवश्यकताओं के बीच परिभाषित करने वाले अनुपम जी कम के बीच ही जीवन को सदा भरा-पुरा रखा। पहले महज 6 हजार रुपए में जीवनयापन किया और बाद के वर्षों में अधिक-से-अधिक 12 हजार रुपए। उनका जीवन कम के बीच अपार की कहानी था।

अनुपम अपने सारे काम चुपचाप रहकर करते थे। चुप रहकर काम करने को श्री मिश्र ने अपने स्वभाव में कुछ इस तरह से पिरो लिये थे कि अपने अन्दर की तकलीफों को भी उन्होंने और किसी के साथ नहीं बाँटा। पर्यावरण के लिये उनकी चिन्ता उनकी आत्मा से जुड़ी थी। ये उनके लिये महज एक काम भर नहीं था। साल 1973 के चिपको आन्दोलन और उसके हीरो चंडीप्रसाद भट्ट को उस जमाने में चर्चित बनाने में अनुपम मिश्र ने बहुत मेहनत की थी। अनुपम भी एक ऐसे ही यात्री थे। वे अगर खोज में नहीं जुटते तो राजस्थान के जैसलमेर जैसे इलाके के कई ऐसे तालाब दुनिया की नजरों से हमेशा के लिये ओझल रह जाते जिनके मीठे पानी के दम पर एक बड़ी आबादी तमाम संघर्षों के बावजूद अभी तक कायम है। ऐसे समय में जबकि भारत में लगभग हर साल ही सूखे की समस्या बनी रहती है।

 

अनुपम द्वारा जल संरक्षण के लिये बताए गए पारम्परिक तरीके सबसे आसान और प्रभावी साबित होते हैं। भारत में सदियों से अपनाई जा रही जल संरक्षण तकनीकों की जानकारी में उन्हें महारथ हासिल था। श्री मिश्र ने देश-विदेश में बताया कि किस तरह भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग अपनी भौगोलिक स्थिति, संसाधनों की उपलब्धता और जरूरतों को समझते हुए जल संरक्षण के कारगर तरीके अपनाते थे। उनका कहना था कि आधुनिक जल परियोजनाएँ इन पारम्परिक तरीकों के आगे फीकी और कम असरदार हैं। वे लिखने पढ़ने वालों से अक्सर कहते थे, सरल रहो, सहज रहो और जैसे जीते हो वैसा लिखो। वे कहते थे, सभी लेखक पीपल या बरगद का पेड़ नहीं हो जाएँगे। जरूरी नहीं कि हर लेखक बड़ा हो जाये। कुछ लेखक पत्तियाँ भी बनेंगे और शाख भी। समाज देखता है। जरूरी नहीं कि जो इस समय बड़ा हो, वह बाद में भी बड़ा हो जाये। मूल्यांकन समाज करेगा। चार से पाँच पन्ने के लेख से लेकर चालीस पन्ने के लेख को सम्पादित कर देने का काम अनुपम मिश्र ही कर सकते थे।

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है। इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठाई थी। उनके द्वारा लिखी गई लेख ‘साध्य साधन और साधना’ के अनुसार यह न अलंकरण है न अहंकार। अलंकरण और अहंकार से मुक्त अनुपम मिश्र का परिचय देना हो तो प्रख्यात कहकर समेट दिया जाता है। उनके लिये यह परिचय मुझे हमेशा अधूरा लगता है। फिर हमें अपनी समझ की सीमाओं का भी ध्यान आता है। हम चौखटों में समेटने के अभ्यस्त हैं इसलिये जब किसी को जानने निकलते हैं तो उसको भी अपनी समझ के चौखटों में समटेकर उसका एक परिचय गढ़ देते हैं। लेकिन क्या वह केवल वही है जिसे हमने अपनी सुविधानुसार एक परिचय दे दिया है? कम-से-कम अनुपम मिश्र के बारे में यह बात लागू नहीं होती। वे हमारी समझ की सीमाओं को लाँघ जाते हैं। उनको समझने के लिये हमें अपनी समझ की सीमाओं को विस्तार देना होगा। अपने दायरे फैलाने होंगे। असीम की समझ से समझेंगे तो अनुपम मिश्र समझ में आएँगे और यह भी कि वे केवल प्रख्यात पर्यावरणविद नहीं हैं।

हालांकि उन्हें हमेशा ऐतराज रहता था कि जब कोई उनके बारे में बोले-कहे या लिखे। उन्हें लगता है कि उनके बारे में लिखने से अच्छा है उनकी किताब “आज भी खरे हैं तालाब” के बारे में दो शब्द लिखे जाएँ। कितने लाख लोग अनुपम मिश्र को जानते हैं इससे कोई खास मतलब नहीं है कितनी प्रतियाँ इस किताब की बिकी हैं सारा मतलब इससे है। तो क्या अनुपम मिश्र अपनी रॉयल्टी की चिन्ता में लगे रहने वाले व्यक्ति हैं जो अपनी किताब को लेकर इतने चिन्तित रहते हैं? शायद। क्योंकि उनकी रायल्टी थी कि समाज ज्यादा-से-ज्यादा तालाब के बारे में अपनी धारणा ठीक करें। पानी के बारे में अपनी धारणा ठीक करे। पर्यावरण के बारे में अपनी धारणा ठीक करे। भारत और भारतीयता के बारे में अपनी धारणा शुद्ध करे। अगर यह सब होता है तो अनुपम मिश्र को उनकी रायल्टी मिल जाती है। और किताब पर लिखा यह वाक्य आपको प्रेरित करे कि इस पुस्तक पर कोई कॉपीराईट नहीं है, तो आप इस किताब में छिपी ज्ञानगंगा का अपनी सुविधानुसार जैसा चाहें वैसा प्रवाह निर्मित कर सकते हैं। यह जिस रास्ते गुजरेगी कल्याण करेगी।

अनुपम मिश्र की किताब “आज भी खरे हैं तालाब” ने पानी के मुद्दे पर बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन किये हैं। राजस्थान के अलवर में राजेन्द्र सिंह के पानीवाले काम को सभी जानते हैं। इस काम के लिये उन्हें मैगसेसे पुरस्कार भी मिल चुका है। लेकिन इस काम में जन की भागीदारी वाला नुख्सा अनुपम मिश्र ने गढ़ा। राजेन्द्र सिंह के बनाए तरुण भारत संघ के लम्बे समय तक अध्यक्ष रहे। शुरुआत में राजेन्द्र सिंह के साथ जिन दो लोगों ने मिलकर काम किया उसमें एक हैं अनुपम मिश्र और दूसरे सीएसई के संस्थापक अनिल अग्रवाल। सच कहें तो इन्हीं दो लोगों ने पूरे कार्य को वैचारिक आधार दिया। राजेन्द्र सिंह ने जमीनी मेहनत की और अलवर में पानी का ऐसा वैकल्पिक कार्य खड़ा हो गया जो आज देश के लिये एक उदाहरण है।

 

पर्यावरण संरक्षण को लेकर उनका योगदान भी हमेशा याद किया जाएगा। पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों पर काम शुरू करने वाले वह भारत के पहले व्यक्ति हैं। जब देश में पर्यावरण का कोई विभाग नहीं था। बिना बजट के श्री मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस बारीकी से खोज खबर ली, वह करोड़ों रुपए बजट वाले विभागों और परियोजनाओं के लिये सम्भव नहीं है। गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। उन्होंने बाढ़ के पानी के प्रबन्धन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास का महत्त्वपूर्ण काम किया है। उनके इन्हीं सब कार्यों को लेकर 1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च इन्दिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार, 2007-08 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चन्द्रशेखर आजाद राष्ट्रीय पुरस्कार, 2011 में देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार एवं कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

अनुपम मिश्र भले ही अपने बारे में लिखने की जरूरत नहीं समझी हो, लेकिन हमें अनुपम मिश्र को बहुत संजीदगी से पढ़ने की जरूरत है। उनकी पानी पर्यावरण की परम्परागत शिक्षा को सहेजकर अपने आने वाली पीढ़ियों दें। यही हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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