क्योंकि दिल्ली से हिमालय नहीं दिखता 

प्रसिद्व मंच संचालक व वरिष्ठ कवि गणेश खुगशाल ग​णि 
—गणि दा की साहित्य व सांस्कृतिक यात्रा पर एक नजर 
—हिमालयी सरोकारों की प्रतिनिधि पत्रिका धाद के संपादक
,,,,,,बचपन में गांव से उछल—उछलकर हिमालय देखने को आतुर रहने वाले प्रसिद्व मंच संचालक व वरिष्ठ कवि गणेश खुगशाल गणि को जब दिल्ली से हिमालय नहीं दिखा तो उन्होंने दिल्ली को नमस्कार कर दिया और पौड़ी आ गये। इसके बाद वे पौड़ी के ही होकर रह गये। कई बार पौड़ी से बाहर मीडिया में नौकरी करने के मौके मिले लेकिन उन्होंने पौड़ी नहीं छोड़ा। गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी के मंचों का संचालन करने वाले गणि दा कुशल संचालक के साथ ही वरिष्ठ कवि भी हैं। उन्हें गढ़वाली लोक साहित्य में हाइकू कविता शैली का जनक भी माना जाता है। लोक साहित्य में उनका लंबा सफर है जो अभी जारी है। हिमालयी सरोकारों का प्रतिनिध्त्वि करने वाली धाद पत्रिका के संपादक गणि दा पत्रिका के माध्यम से भी लोकभाषा का संरक्षण कर रहे हैं। पेश हैं गणि दा से बातचीत के संपादित अंश। कुछ पूछा गया तो सहजता से बताया गणि दा ने।
सवाल— गणि दा, आज आप बड़े मंचों की कुशल संचालक हैं ये हुनर बचपन से ही आपके अंदर था।
उत्तर—हा, हा, हा,, नहीं जी। ये हुनर बचपन में नहीं था। बचपन में तो स्कूली कार्यक्रमों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों से दूर ही रहता था। गुरू जी कहते थे गीत गाओ या फिर पत्थर लाने होंगे। मैं पत्थर ही लाता था।
सवाल— फिर  ये हुनर आपके अंदर कैसे आया। इसके पीछे कोई प्रेरणा रही है।
उत्तर—दरअसल, प्रेरणा तो हमेशा ही गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी की रही है।
बचपन से ही नेगी जी को सुनता आ रहा हूं। जो कुछ भी हूं इसे देवसंयोग ही कहा जायेगा। लोकभाषा के प्रति प्रेम और लगाव बचपन से ही रहा है।
सवाल—पहाड़ और लोकभाषा के प्रति लगाव कैसे बढ़ता गया।
उत्तर—दरअसल, मैं सरकारी नौकरी कर रहा था। साल—1987 की बात है मैं भोपाल में रहता था और वहां मेरी पूज्य माताश्री की मौत हो गयी। उस दौरान निचली मंजिल में लोग टेलीविजन देख रहे थे जो मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने कहा कि ये शहर संवेदनहीन शहर है और मैंने भोपाल छोड़ दिया। मुझे लगता है कि आज हर शहर संवेदनहीन शहर है।
सवाल— आपकी पहली कविता कौन सी थी।
उत्तर— कब तलैकि डौंरू बजली, कब तलैकि बजेली थाली। यह मेरी पहली गढ़वाली कविता थी।
सवाल— ग​णि दा, आप रामलीला मंचन देखने भी जाते थे।
उत्तर— हां, बहुत शौक था लेकिन पिताजी नहीं जाने देते थे, कहते थे कि बस दो दिन ही जाना है मंचन देखने को।
सवाल—आप आकाशवाणी से कब और कैसे जुड़े।
उत्तर— मैं बचपन से ही आकाशवाणी से प्रसारित ग्राम जगत कार्यक्रम खूब सुनता था और कविता लिखते लिखते मैंने कई बार आकाशवाणी को भी पत्र लिखे। आखिरकार साल—1988 में श्री चक्रधर कंडवाल जी ने आ​काशवाणी से कविता पाठ करने का सौभाग्य दिया।
सवाल—आप मंच संचालन से कैसे जुड़े।
उत्तर—असल में, एक कार्यक्रम में  मैंने नरेंद्र सिंह नेगी की मौजूदगी में काव्य पाठ किया था। इसके बाद एक अन्य कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह नेगी जी ने कहा कि  गणि संचालन तू ही करेगा, मैंने कहा कि मुझे तो आता ही नहीं है। इस पर नेगी जी ने कहा कि जहां रूक जाओगे, वहां मैं बोलूंगा। यही से संचालन का सफर शुरू हुआ और ये सब नेगी जी की देन है।
सवाल— आप धाद से भी जुड़े।
उत्तर— जी हां, करीब 1988 में मुझे धाद से जुड़ने का सौभाग्य मिला और मैं प​त्रिका में लेखन भी करता रहा और धाद के कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी भी।
सवाल— लोकभाषा की वर्तमान दशा व दिशा क्या है।
उत्तर— बेशक, लोकभाषा पर काम हो रहा है लेखन हो रहा है लेकिन नयी पीढ़ी लोकभाषा से दूर होती जा रही है। इस पर ध्यान देने की नितांत जरूरत है।

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