कृषि जोत का सिकुड़ना गंभीर चिंता का विषय: डॉ तेज प्रताप

पलायन के कारण वन भूमि में तब्दील हो रही कृषि भूमि
पलायन पर काबू न किया तो पहाड़ बन सकता है नोमैन्स लैंड

अजय अजेय रावत 
पहाड़़ के नाम पर गठित पृथक पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के पहाड़ो सें खाली होते गांव व पलायन की समस्या दिनो दिन विकराल रूप धारण करने लगी है। गांवों में घर खंडहर में तब्दील हो रहे हैं, वहीं खेत बंजर वियावान बनते जा रहे हैं। भयावह होती इस तस्वीर के प्रति अब भले ही सरकार चिंतित नजर आ रही हो, लेकिन धरातल पर अभी कोई ऐसा प्रयास नहीं दिखाई देता कि पहाड़ के पुनः सरसब्ज होने की उम्मीद हो। इस समस्या के प्रति सरकार के साथ अनेक सिविल सोसाइटी भी काफी चिंतित हैं। पलायन न्यूनीकरण की दिशा में कार्य कर रहे पलायन एक चिंतन समूह द्वारा भी पलायन के कारणों व इसके निदान के बावत अध्ययन किया जा रहा है। हाल ही में इस अभियान के सलाहकार व शिमला विवि के उपकुलपति डा तेज प्रतात सिंह ने उत्तराखंड में पलायन से सर्वाधिक प्रभावित पौड़ी जनपद के गांवो का भ्रमण किया। उन्होने असवालस्यूं के मिरचोड़ा गांव में पलायन एक चिंतन अभियान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में शिकरत करते हुए हिमालयी राज्यों के किए गए अपने शोध को भी साझा किया। उन्होने जिले के बलूनी, कोठार, नगर जैसे पलायन से खाली होते गांवों में कृषि और उद्यानिकी की संभावनाओं का जायजा भी लिया। उन्होने पत्रकार एवं पलायन एक चिंतन अभियान के सचिव अजय अजेय रावत से भी अपने अनुभव व सुझाव साझा किए। प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ अंश

शेर-ए-काश्मीर एवं पालम पुर विवि के पूर्व उपकुलपति एवं वर्तमान में शिमला विवि के कुलपति डा तेज प्रताप सिंह ने उत्तराखंड में लगातार बंजर होती जा रही कृषि भूमि पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यूं चुपचाप कृषिभूमि के बंजर में तब्दील होते देखना एक तरह से आपराधिक कृत्य है। इसके लिए भूस्वामियों से अधिक जिम्मेदार सरकार है। भारत में बढ़ती आबादी के मध्यनजर आने वाले दशकों में खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर भी जूझना एक बड़ी चुनौती होगा। अब जबकि गंगा व युमाना के दोआब वाले मैदानी इलाकों की कृषिभूमि शहरीकरण की भेंट चढ़ गई है ऐसे में भविष्य में केवल पहाड़ों पर ही खेती योग्य जमीन उपलब्ध रहेगी। सरकार को चाहिए कि जापान व कोरिया की तर्ज पर पहाड़ की खेती के लिए पृथक नीति व कानून बनाकर किसान व खेतों को पुनर्जीवित करे। इतना ही नहीं स्विटजरलैंड की भांति वन विभाग पहाड़ में रहकर खेती कर रहे किसानों को पेंशन भी मुहैय्या कराए।

वनों का क्षेत्रफल बढ़ना शर्म का विषय

पहाड़ में पलायन के न्यूनीकरण को लेकर कार्य कर रहे पलायन एक चिंतन अभियान के स्वैच्छिक सलाहकार व अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पारिस्थितिकी व उद्यानिकी वैज्ञानिक डा तेज प्रताप सिंह ने पौड़ी जनपद का सघन भ्रमण किया। डा सिंह ने कहा कि आज बेतहाशा पलायन के कारण उत्तराखंड के पहाड़ के खेत बंजर में तब्दील हो गए हैं, इतना ही नहीं इन खेतों में दिन प्रतिदिन जंगल उगने लगे हैं, जो शर्म का विषय है। पहाड़ी राज्यों में पहले से ही खेती योग्य भूमि का प्रतिशत दस से भी कम है, जबकि वन भूमि साठ फीसद से भी अधिक। यदि किसी कृषि भूमि पर एक बार पेड़ उग गए तो कड़े वन कानूनों के चलते वहां उगे पेड़ हटाने संभव नहीं होगा, परिणामस्वरूप यह कृषिभूमि एक दिन वन भूमि में तब्दील हो जाएगी। उनका मानना है कि बढ़ती आबादी और संकुचित होती कृषि जोत के इस दौर में खेती योग्य भूमि को इस प्रकार चुपचाप जंगल में तब्दील होते देखना एक प्रकार से अपराध है। इस अपराध में भूस्वामियों से अधिक जिम्मेदार सरकारें हैं।

स्विटजरलैंड की भांति वन विभाग दे प्रोत्साहन राशि

डॉ सिंह ने स्विटजरलैंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पहाड़ों में इनसानी मौजूदगी को बनाए रखने व वहां की खेती को जीवित रखने के लिए वन महकमें द्वारा किसानों को प्रोत्साहन राशि दी जाती है। इतना ही नहीं स्थाई रूप से खेती किसानी करने वाले पहाड़ी वाशिंदों को वन विभाग द्वारा पेंशन दिए जाने का प्रावधान भी है। उन्होने जापान का उदाहरण देते हुए बताया कि जापान में भी पहाड़ों से पलायन की दर बढ़ने के मामले को देखते हुए वहां की संसद द्वारा इस मुद्दे पर बहस कर एक हिल फेवर्ड एग्रीकल्चर पाॅलिसी बनाई गई। इस पाॅॅलिसी के तहत पहाड़ में खेती करने वाले काश्तकारों को मोटी प्रोत्साहन राशि के साथ स्थाई रूप से खेती करने वाले काश्तकारों को पेंशन देेने का प्रावधान भी किया गया, जो लोग शहरों से पहाड़ी गांवों में जाने के इच्छुक थे उन्हे सब्सिडी भी दी गई। वहीं कोरिया में भी ऐसा कानून बनाया गया कि जो लोग गांव छोड़कर जाएं उन्हे यह सुनिश्चित करना होगा कि अपने पीछे छोड़े हुए खेत किसी भी दशा में बंजर न हों, कोरिया में भी पहाड़ में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन राशि का प्रावधान है।

कैश क्राॅप के लिए माहौल बनाए सरकार

हिमांचल को उदाहरण देते हुए डा तेज प्रताप ने कहा कि ऐसा नहीं है कि हिमांचल में परंपरागत खेती कोई बहुत बड़े फायदे का सौदा रही हो, हिमांचल में भी काश्तकारों द्वारा परंपरागत खेती को छोड़ कैश क्राॅॅप शुरू कर एक नई इबादत लिखी गई। डा सिंह ने बताया कि गत वर्ष उनके द्वारा उत्तर पूर्व से जम्मूकाश्मीर तक हिमालयी राज्यों का व्यापक अध्ययन किया गया। उन्होने पाया कि मनरेगा से नकदी व पीडीएस सिस्टम से सस्ती राशन मिलने के कारण लोगों ने मजबूरी वाली यानी परंपरागत खेती छोड़ दी, जिससे खेत बंजर होने लगे। उनका कहना था कि हिमांचल के काश्तकारों ने भी परंपरागत खेती से किनाराकशी कर ली है, लेकिन उन्होने इन खेतों को खाली छोड़ने के बजाए यहां नकदी फसलों का उत्पादन शुरू किया, जिससे न केवल उनकी बल्कि राज्य की आर्थिक दशा में भी क्रांतिकारी सुधार हुआ है। उन्होने इस बात पर भी जोर दिया कि कृषि व उद्यान संबंधी शोध के लिए राज्य में स्थापित अनुसंधान संस्थान वहां की स्थानीय जरूरतों के मुताबिक शोध करें।

हिमांचल व उत्तराखंड में अंतर

डॉ सिंह ने पलायन के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां हिमांचल में सबसे अधिक उंचाई पर रहने वाले लोग सबसे अधिक समृद्ध हैं वहीं मध्यम उंचाई वाले दूसरे पायदान में, जबकि हिमांचल में तराई में वहां के वाशिंदे रहना ही नहीं चाहते, जबकि उत्तराखंड में इसके उलट स्थितियां होना, यहां की सरकारों की इच्छाशक्ति पर सवालिया निशान छोड़ती हैं। उनका यह भी कहना था कि हिमांचल में भूमि के एक छोटे से हिस्से का खाली रहना या बंजर रहना बेहद शर्म का विषय माना जाता है, वहीं उत्तराखंड में बेहतर परिस्थिति वाले खेत खलिहान भी झाड़ियों से अटे पड़े हैं।

कंपेनाइज खेती से बचाए जा सकतें है पहाड़ के खेत

दुनिया के दर्जनों देशों के पहाड़ी इलाकों में कृषि पर शोध कर चुके डा सिंह का कहना है कि बिखरी व छोटी छोटी जोत पर खेती कर शायद आज की जरूरतों के मुताबिक धनार्जन मुश्किल होगा। ऐसे में गांव में बंजर पड़े खेतों को आबाद करने के लिए कंपेनाइज एग्रीकल्चर के फार्मूले के मुताबिक कार्य करना होगा। काॅरपोरेट खेती व कोआॅपरेटिव खेती की जटिलताओं के मध्य कंपेनाइज खेती एक बेहतर विकल्प है। इसके तहत गांव के सक्षम लोग गांव की सारी जमीन पर अपनी सुविधा के मुताबिक खेती कर सकते हैं, जिसके लिए सरकारी स्तर पर कोई नियम या कानून बनाया जा सकता हैं, इससे भूमि स्वामित्व संबंधी जटिलताएं भी आड़े नहीं आएंगी। क्षेत्र की आबोहवा के मुताबिक क्लस्टर विकसित कर कैश क्रोप उगाकर किसानों के साथ भूस्वामियों की आर्थिकी भी मजबूत होगी साथ ही राज्य व देश की जीडीपी में भी योगदान होगा।

एग्रीटूरिज्म भी बेहतर विकल्प

स्विटजरलैंड का उदाहरण देते हुए डा सिंह ने कहा कि वहां वन विभाग व पर्यटन महकमें ने संयुक्त योजना बनाकर खेत व जंगल को सीधे पयर्टकों जोड़ दिया। यहां तक कि डेयरी फार्म में गाय पालकर इसे भी एक नए तरह के पर्यटन के रूप में विकसित कर किसानों व स्थानीय वाशिंदों की आर्थिकी को मजबूत किया गया।

कृषि जोत घटना वैश्विक चुनौती

डॉ सिंह का कहना था कि कृषि जोत घटना न सिर्फ उत्तराखंड या भारत की समस्या नहीं बल्कि के ग्लोबल मसला है। भारत और चीन जैसे विशाल आबादी के मुल्कों के समक्ष आने वाले दशकों में खाद्य सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा होगा। हालांकि अभी भी चीन व भारत की सरकार मध्य अफ्रीकी मुल्कों में लीज पर जमीन लेकर खेती की योजना बना रही हैं, लेकिन इससे बेहतर होगा कि वह पहाड़ व पठारों में बंजर होती जमीनों को सरसब्ज करने हेतु योजना बनाए। भारत व चीन में यदि खाद्य संकट हुआ तो इसका असर समूचे विश्व पर पड़ना तय है। भले ही अपनी क्रय शक्ति को देखते हुए भारत व चीन दुनिया भर से अनाज खरीद लें, लेकिन इससे कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्यान्न के दामों का बढ़ना लाजिमी है, जिससे गरीब देशों में भुखमरी की समस्या पैदा हो सकती है, ऐसा वर्ष 2008-09 में हो भी चुका है जब भारत ने बड़ी तादात में चावल आयात किए थे। आज उत्तर भारत के सबसे उपजाउ मैदान शहरीकरण की भेंट चढ़ गए हैं, ऐसे में पहाड़ों के खेत व किसान को बचाना ही मौजूदा दौर की सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है।

NO COMMENTS