माता मूर्ति! – 21 सितम्बर को माँ से मिलने जायेंगे बद्रीविशाल, पूछेंगे कुशलक्षेम। माँ की गोद में होगा अभिषेक और लगेगा भोग।

संजय चौहान

बदरीनाथ धाम हिंदुओ की आस्था का सर्वोच्च धाम है। इसे बैकुंठ धाम के नाम से भी जाना जाता है। जगतगुरू शंकराचार्य नें इसकी स्थापना की थी। बैकुंठधाम में धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करना बेहद जरूरी होता है। यहां के मुख्य पुजारी भी इन परंपराओं से बंधे हैं। परंपराओं के अनुसार कपाट खुलने के दिन से धाम के रावल रोजाना सुबह तप्त कुंड में स्नान करने के बाद सीधे मंदिर में पूजा अर्चना के लिए जाएंगे। इस दौरान उनके साथ दो स्वसंसेवक उनके आगे सोने की छड़ी लेकर चलेंगे। इस दौरान रावल को कोई भी श्रद्धालु स्पर्श नहीं कर सकता। प्रत्येक दिन रावल सुबह से शाम तक चार बार रावल कुंड में स्नान करने के बाद मंदिर में प्रवेश कर पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक नियमों के अनुसार बावन द्वादशी पर्व पर माता मूर्ति मेले में ही रावल पहली बार बदरीनाथ धाम के पंचशिला क्षेत्र से बाहर निकलते हैं। माता मूर्ति मेले तक रावल अपने निवास स्थान में अपने रसोइये के बनाए भोजन को ही ग्रहण करते हैं।

बामनद्बावदशी के दिन बद्रीविशाल में मातामूर्ति मेले का आयोजन होता है। बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर दूर है माता मूर्ति का मंदिर। माता मूर्ति भगवान बद्रीविशाल जी की माता है। मान्यता है कि जब नर-नारायण ने अपनी माता की श्रद्धा भाव से सेवा की तो इससे खुश होकर माता मूर्ति ने उन्हें वर मांगने को कहा। नर- नारायण ने माता मूर्ति से घर बार छोड़कर तपस्वी बनने का वरदान मांगा तो मां परेशान हो गई। लेकिन वह अपने को रोक नहीं पाई। इसलिए माता को उन्हें वचन देना ही पड़ा। जब वर्षों तक तपस्या में लीन रहने पर वे वापस नहीं आए तो माता खुद उनकी खोज में बद्रीकाश्रम पहुंचीं। उनकी हालात देख वे काफी दुखी हुईं बाद में नर-नारायण के आग्रह पर माता मूर्ति ने भी माणा गांव के ठीक सामने एकांत स्थान में तपस्या शुरू कर दी। तब माता ने उन्हें कहा कि तुम वर्ष में एक बार मुझसे मिलने जरूर आओगे। तब से नर- नारायण वर्ष में एक बार माता मूर्ति से मिलने यहां आते हैं। इस दिन भगवान का अभिषेक भी माता की गोद में ही होता है और माँ की गोद में ही भोग लगता हैं।

बैकुंठधाम में विगत 20 बरसों से भगवान बद्रीविशाल की सेवा करने वाले धार्मिक परंपराओं के विद्वान सुनील कोठियाल कहते है कि बामन द्वादशी के पर्व पर बद्रीनाथ धाम में सुबह की पूजा अर्चना के बाद रावल जी की उपस्थिति में उद्दव जी भगवान बद्रीविशाल के प्रतिनिधि के रूप में माता मूर्ति से मिलने बद्रीकाश्रम के बाम भाग मूर्तिधाम पहुचतें है। सनातन काल से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा का गवाह बनने देश के ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु यहाँ पहुंचते हैं। इस धार्मिक आयोजन के बाद मुख्य पुजारी अलकनंदा नदी पार कर देव दर्शनी तक आ जा सकते हैं। इस अवसर पर सुबह दस बजे से सायं 3 बजे तक बद्रीनाथ जी का मंदिर बंद रहता है।

इस साल 21 सितम्बर को बामनद्बावदशी का मेला लगेगा। अगर आपके पास समय हो तो जरूर बामनद्धावदशी मेले में शरीक होने चले आइये बैकुंठधाम ……

जय बद्रीविशाल!

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