मुश्किल में अन्नदाता…..

अखिलेश डिमरी

इस बीच किसानों के आंदोलन पर हो रहे खर्चे को बैनर टोपी से जोड़ कर देखने या किसानों के पैद्ल मार्च या आंदोलनों को राजनैतिक रूप से लाल या हरे रंग में देखने समझने वालों को यह भी समझना होगा कि किसी भी रंग का झंडा हाथ में थामे किसान की जिंदगी असल में बेरंग है , इसलिए यह सबसे जरूरी है कि किसान पर टिप्पणी करते वक्त इस देश की बहुतायत बौद्धिक राजनैतिक आबादी यह भूल रही होती है कि किसान ने कर्ज़ा हमारी पेट की कीमत पर लिया होता है …।

हालाँकि इस देश में मुख्यधारा की मीडिया अथवा सोशियल मीडिया पर हमेशा ही मसखरे बने रहने का दौर  चल रहा है , जिसमें आँकड़ों की बुनियाद पर कोई भी विश्लेषण करना वैसा ही है जैसे अंधों के शहर में  आईने की दुकान खोल कर बैठ जाना लेकिन इस दौर को दरकिनार कर आँकड़ों को सामने रखे जाने का साहस किसी न किसी को आज नही तो कभी तो दिखाना ही होगा ।

कभी किसानों पर चढ़े कर्जे को कभी नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन  के मार्च 2017 के आँकड़ों में तौल कर देखिएगा तो आपको पता चलता है कि इस देश के किसानों पर 18.25 लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ है जिसमें से 10.65 लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ ही संस्थागत  याने किसी वित्तीय संस्था के  माध्यम से है और शेष 7.35 लाख करोड़ रुपये का कर गैर संस्थागत स्रोतों से है , गैर संस्थागत स्रोत याने सेठ, साहूकार, आढ़ती, बनिया आदि आदि ……! अब आप इस  आँकड़े को प्रतिशत में तोल कर देखिए तो जो सच्चाई आपके सामने होगी वो इस ओर इशारा कर रही होगी कि किसानों पर कुल ऋण के सापेक्ष 41% से अधिक ऋण राशि तो आज भी बहस के दायरे से बाहर है , ये पैदल मार्च, डंडे झंडे टोपी तो सब उस 59% के लिए ही है जिस पर सरकारें कुछ कर सकती हैं।

छोड़िये आप वर्ष 2005-06 से लेकर वर्ष 2015-16 तक किसानों से संबंधित आँकड़ों का कभी विश्लेषण तो कीजिए फिर आपको पता लगेगा की इन दस सालों में खेती किसानी के खर्चों में 6 से 8 गुने की वृद्धि हुई है , सरकारी आँकड़े बताते हैं कि अपने देश में कुल 9.02 करोड़  किसानों में से  4.67 करोड़ याने लगभग 52% किसानों पर कर्ज़ा है ओर सनद रहे कि सरकारी आँकड़ों में ये वो कर्ज़दार किसान है जिन्होने संस्थागत माध्यमों याने वित्तीय संस्थाओं बैंकों से ऋण लिया है जबकि नेशनल सेंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन के अनुमान के मुताबिक 41% किसानों का कर्ज़ा आज भी गैर संस्थागत होता है ।

नेशनल सेंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन का ही एक सर्वे यह भी कहता है कि अपने देश में ग्रामीण आबादी के कुल  31.4% परिवार और शहरी आबादी के लगभग 22.4% परिवार कर्ज़दार हैं, लेकिन इस देश में रहने वाले  52% से अधिक किसान परिवार कर्ज़दार हैं , अब आप सोचिये कि अन्नदाता की पारिवारिक स्थिति क्या और कैसी है …? इस आँकड़े का विश्लेषण करते हुए एक बात ओर भी ध्यान में रखिएगा कि इस देश के केवल 8% सामान्य परिवार ही ग़ैरसन्स्थागत स्रोतों से ऋण लेते हैं अथवा उनके द्वारा लिया जाने वाला ऋण न तो सामाजिक ऋण होता है और न ही इतना  होता है कि उन परिवारों को आत्महत्या करनी पड़े जबकि सरकारी आँकड़ों के अनुसार वर्ष  1996 से लेकर 2015 तक ही इस देश के 314718 किसान आत्महत्या  कर चुके हैं।

किसानों के आंदोलनों को किसी भी और नजर से देखने दिखाने की कोशिश करने से पहले एक चौंकाने वाला आँकड़ा  और समझ लेना चाहिए कि अपने देश में कुछ प्रमुख राज्यों  के किसानों की ग़ैरसन्स्थागत स्रोतों से लिए कर्ज़ की क्या स्तिथि है …? ताकि जब आप सरकारों का आंकलन करें तो आपको इस हमाम में सबका अंदाज़ा हो सके, गैर संस्थागत ऋण के मामले में राजस्थान 1.30 लाख रुपये प्रति किसान और बिहार 1.02 लाख प्रति किसान सबसे आगे हैं, जबकि आंध्रप्रदेश में प्रति किसान 79.70 हजार रुपये, कर्नाटक में 78.30 हजार रुपये, पश्चिम बंगाल में 40.83 हजार रुपये और मध्यप्रदेश में 38 हजार रुपये का गैर संस्थागत स्रोतों से लिया कर्जा है,  कतिपय मामलों मे तो यह भी पता चला है कि सेठ साहूकारों से लिए जाने वाले कर्जे में ब्याज दर 30% के आस पास होती है .

नीतियों को समझिये कि अपने देश की विडंबना है  कृषि से संबंधित ऋणो को देते समय उसे  अनुत्पादक ऋण की तरह पेश किया जाता है और इससे ज़्यादा मज़े की बात ये है कि हम जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी इन ऋणो की ये परिभाषा  स्वीकार भी लेते हैं पर आँकड़े कुछ और ही कहते हैं  कि सरकारी आँकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2017  तक अपने देश के निजी ऑर सरकारी बेंकों का कुल मिला कर 7.15 लाख करोड़ का ऐसा ऋण था जो एन पी ए के रूप में दर्ज था ओर इस ऋण में से भी 6.40 लाख करोड़ का ऋण सरकारी बेंकों के खाते में दर्ज था , लेकिन इस आँकड़े का सबसे चौंकाने वाला पक्ष ये है कि संकट से जूझ रहे कृषि क्षेत्र के लिए दिए गये ऋण में से केवल 62.3 हज़ार करोड़ अर्थात कुल एन पी ए का 8.7 प्रतिशत था . अब आप समझिए कि नीरव मोदी और माल्या जैसे लुटेरों के बीच इस देश के 9.02 करोड़ किसानों के मुस्तकिल में वितीय संस्थाओं द्वारा खेती किसानी के लिए ऋण देने की परिभाषाएँ गैर उत्पादक ऋण की तरह पेश की जाती रही है और सरकारें किसानों के कर्जे को माफ़ करने के कदम को आर्थिक रूप से बर्बादी की ओर ले जाने वाला कदम मानने की बात कह कर पल्ल्ल झाड़ लेती हैं.

अरे साहब पूरे दिन भर न सही दिन के दो वक्त ही सही….! जब आपके  पीछे  से एयर कंडीशनर, कूलर  या पंखे की हवा आपके शरीर को हल्का कर रही हो ओर आप डाइनिंग टेबल या अपने कीछन के अहाते में  फ़ुर्सत से  रोटी या भात का मज़ा ले रहे हों तो सोचिएगा  कि ये सामने थाली पर रख कर आप खा रहे हैं वो जिसने उगाया है उसने नवंबर दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड  में नंगे पाँव ज़मीन नाप कर इस बीज को खेत में डाला है , जब आप रज़ाई में से ही अपने कार्यालयों को मसेज करते हुए कह रहे थे कि नाट एबल तू क़म एट आफ़िस दयू टू हेवी फाग तब वो खेत में कोमल सी खड़ी  गेंहूँ की फसल को बचाने के लिए दूसरी बान्त का पानी दे रहा था , और जब आप इस लिखे हुए को पढ़  रहे हैं वो तब भी एक दुशाला डाले अपने खेत का चक्कर लगा रहा होगा कि फसल बढ़ेगी तो फिर से आपकी थाली तक पंहुचेगी…..!  और आप हैं कि ये कहते फिर रहे हैं कि इस देश के नंगे पाँव चल कर अपनी बात कहने को पंहूचने  वाला किसान राजनीति से प्रेरित है ……………….?

हुजूर  आँकड़े ये भी कहते हैं कि इस देश के किसान पर औसतन 1.8 लाख का कर्ज़ा है जिसे वो माफ़ करने की बात कर रहा है .., वो भी महज इसलिए कि आपने हमने उसे कभी मुख्य धारा में रख कर सोचा ही नही …….!  फिर कहता हूँ कि याद रखिए कि आप हवाई जहाज़ बना सकते हैं लेकिन अन्न नहीं बना सकते , अन्न बनाने के लिए आपकी निर्भरता किसान पर ही होगी इसलिए  समय है अन्न दाता के लिए संजीदा हो जाइए , वरना वो दौर दूर नहीं जब डेबिट क्रेडिट कार्डों की तो भरमार होगी लेकिन खाने को पर्याप्त  अनाज नहीं होगा …? इस आहट को पहचानने की शायद अब जरूरत है।

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