पूनम राणा ! दुःखो के पहाड़ से लडकर, हौंसलो की ऊंची उडान भरकर फतह किया दुनिया का सबसे बड़ा पहाड़ ‘एवरेस्ट’।

संजय चौहान

नवरात्रि का अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है।  उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों से 9 ऐसी देवी तुल्य महिलाओं से रूबरू करवाते हैं जिन्होंने अपने कार्यों, संघर्षों और जिजीवाषा से एक मिशाल पेश की है। नवरात्रि के दिन एक ऐसी बेटी की दास्तान जिसने हर कदम पर दु:खो के पहाड़ से लडकर हौंसला नहीं खोया और आज विश्व की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट को फतह करने में सफलता प्राप्त की। पहाड की उस बेटी का नाम है पूनम राणा।

गुरबत में जिया बचपन, पहाड़ की इस बेटी के हिस्से केवल दुःखों का पहाड़ आया!

उत्तरकाशी से 12 किलोमीटर दूर नाल्ड गांव की पूनम के लिए पहाड़ चढ़ना कोई नई बात नहीं है। ऐसे ही भूगोल में उसकी परवरिश हुई, लेकिन वक्त ने भी उसकी राह में पहाड़ खड़े करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूनम बताती है ‘वर्ष 1997 में मेरा जन्म हुआ और छह माह की थी मां का निधन हो गया। पांच साल की उम्र में पिता भी चल बसे।’ वह कहती है कि हम लोग बहुत गरीब हैं। पिता धर्म सिंह गांव में ही मजदूरी कर किसी तरह हम चार भाई बहनों का पेट भरते थे। थोड़ी सी जमीन भी है, जिससे बामुश्किल कुछ मिल पाता है। पिता के गुजरने के बाद बड़ा भाई मजदूरी कर घर का खर्च चलाने लगा, लेकिन नियति को यह भी मंजूर नहीं हुआ। जून 2015 में अचानक वह बीमार हुआ और उसकी मौत हो गई। इसके बाद उसी साल सितंबर में दूसरे भाई की भी हादसे में जान चली गई। एक के बाद एक इन घटनाओं ने पूनम को पूरी तरह तोड़ दिया। वह बताती है ‘अब परिवार में मैं और एक भाई राम सिंह हैं। भाई एक ट्रैकिंग कैंप में काम करता है।’

बछेंद्री पाल ने दिया पहाड सा हौंसला!

एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला बछेंद्री पाल की प्रेरणा ने उसकी दुनिया बदल दी। 20 मार्च 2016 को पूनम बछेन्द्री पाल के सम्पर्क में आई। तब बछेंद्री ने उन्हें हौसला देते हुए कहा कि पहाड़ में उतार-चढ़ाव होते ही हैं, जिंदगी भी ऐसी ही है। अच्छे दिन भी आएंगे। पूनम बताती है कि ‘उनके ये शब्द मेरे लिए प्रेरणा बन गए।’ इसके बाद पूनम को नेहरू पर्वतारोहण संस्थान से बेसिक और एडवांस कोर्स में प्रवेश दिलाया गया और दोनों कोर्स में बेस्ट स्टूडेंट रही। एवरेस्ट विजेता और निदेशक (टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन) बछेंद्री पाल का कहना है कि इतनी मेहनती लड़की मैंने जीवन में नहीं देखी। कैंप में इसका जज्बा और समर्पण देख मैं समझ गई थी कि एक दिन यह एवरेस्ट फतह करेगी।

21 मई 2018 को फतह किया दुनिया का सबसे बड़ा पहाड़! एवरेस्ट की चोटी पर लहराया तिरंगा..!

27 मार्च को पूनम, स्वर्णलता और नाकुरी गांव के संदीप कठमांडू के लिए रवाना हुए थे। एक अप्रैल से अभियान शुरू किया था। बीच में मौसम खराब होने के कारण बेस कैंप क्षेत्र में मौसम के सही होने का वे इंतजार करते रहे। 18 मई से मौसम जब सही हुआ तो फिर से अभियान शुरू किया। जिसके बाद इन पर्वतारोहियों ने 21 मई 2018 को सुबह 6 बजे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह कर इतिहास रचा।

इन चोटियों का आरोहण कर चुकी है पूनम!

-माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर)
– माउंट कनामो हिमाचल (19600 फीट)
-काला पत्थर नेपाल (18500 फीट)
– रूद्रगैरा गंगोत्री हिमालय (19100 फीट)
-डीकेडी, द्रोपदी का डांडा

वास्तव मे देखा जाय तो पूनम के लिए यह मुकाम हासिल करना आसान नहीं था। बेहद संघर्षों के उपरांत ही पूनम नें अपना मुकाम तय किया है। पूनम उन लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है जो जीवन मे थोड़ी सी कठिनाइयों पर हार मान लेते हैं। शरदीय नवरात्रि प्रराम्भ हुये सात दिन हो गये है। नवरात्रि के सातवें दिन ये आलेख पूनम राणा के साहस, संघर्ष और हौंसलो को एक छोटी सी भेंट …

साभार!
( उक्त आलेख मेरे मित्र और जनसरोकारो की पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ Shailendra Godiyal जी की पूनम राणा से बातचीत पर आधारित)

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