रानी मैसी ! ‘ई- रिक्शा’ के जरिए बदल डाली खुद की तकदीर, बीमार पति और बेटी की पढ़ाई के लिए दिखाया साहस!

संजय चौहान

शरदीय नवरात्रि प्रराम्भ हुये आज छ: दिन हो गये हैं। नवरात्रि का अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। लीजिए ग्राउंड जीरो से नवरात्रि विशेष के तहत 9 दिनों तक आपको उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों से 9 ऐसी देवी तुल्य महिलाओं से रूबरू करवाते हैं जिन्होंने अपने कार्यों, संघर्षों और जिजीवाषा से एक मिशाल पेश की है। नवरात्रि के छटवें दिन एक ऐसी महिला की दास्तान जिसने बेहद विषम परिस्थितियों का सामना कर अपने पति की बीमारी का इलाज और अपनी बेटी को बेहतर शिक्षा देने के लिए रिक्शा चलाने का फैसला किया। वो महिला है उत्तराखंड की पहली महिला ई-रिक्शा चालक हल्द्वानी की रानी मैसी

आर्थिक तंगी और मजबूरी नें सिखाया जिंदगी का कहखरा। एक फैसले नें संवारी जिंदगी।

हल्द्वानी के गांधी नगर वार्ड एक निवासी 45 वर्षीय रानी मैसी के पति बबलू मैसी माली का काम करते थे। तीन साल पहले एक दिन गिरने से उनके सिर पर चोट लग गई। दिमागी चोट के कारण अक्सर उन्हें चक्कर आ जाता। शहर के निजी अस्पताल से इलाज चला। महीने की हजार-बारह सौ की दवा का खर्च उठाना परिवार पर भारी पड़ रहा था। वहीं रानी मैसी की इकलौती बेटी मोहिनी ने मुरादाबाद के नर्सिंग कॉलेज में दाखिला लिया था। परिवार के एकमात्र कमाऊ व्यक्ति के बिस्तर पकडऩे से परिवार के सामने आर्थिक संकट घिर गया था। इस दौरान रानी मैसी को जिंदगी के असली मायने समझ में आये थे। वो चाहती तो दूसरों के घरों का चूल्हा-बर्तन करके अपने परिवार का गुजारा कर सकती थी लेकिन रानी मैसी ये सब नहीं करना चाहती थी, उसे ये सब पंसद नहीं था। जबकि उसके आसपास के सभी लोग भी यही सुझाते थे। रानी नें ढाई साल पहले साहस किया और आगे आई। जिसकी परिणति यह हुई कि आज रानी मैसी आधी आबादी के लिए मिसाल बन चुकी हैं। आज वह अपने परिवार का पूरा खर्च उठाती है और अच्छी खासी आमदनी भी कमाती है।

— हतोत्साहित करने वाले मौन हैं! दूसरे लोगों से मिलती है सराहना।

रानी मैसी नें जब परिवार की खातिर ई- रिक्शा चलाने का निर्णय लिया तो महिलाओं नें उन्हें हतोत्साहित करने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन रानी नें हार नहीं मानी। आज हतोत्साहित करने वाले लोग खुद रानी का सम्मान करते नजर आते हैं। जबकि प्रोत्साहन देने वाले हर जगह सराहना करते हैं।

— महिलाओं के लिए कोई काम मुश्किल नहीं।

रानी कहती हैं ई-रिक्शा ही नहीं, स्वाभिमान जगाने वाले कई दूसरे कामों से भी महिलाएं खुद के पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। रानी (रूंधे हुये गले से) यदि ढ़ाई साल पहले मैंने परिवार के भविष्य के लिए साहस नहीं दिखाया होता तो उसका परिवार पहले की तरह मुश्किलों में होता जबकि बेटी की पढ़ाई भी पूरी हो पाती या नहीं–! आज भी वह गुमनाम होती उसको पहचानने वाला कोई नहीं होता।

महिलाओं को स्वावलंबी के लिए कर रही है प्रोत्साहित! परिवार से मिला साथ।

रानी मैसी अब तक तीन महिलाओं को ई-रिक्शा चला सीखा चुकी हैं। हल्द्वानी के अलावा बाजपुर, किच्छा से महिलाएं प्रशिक्षण लेने पहुंच रही हैं। रानी को प्रेरित करने में देवर एस चरण ‘बंटीÓ का अहम योगदान रहा। रानी समूह से जुड़ी। बैंक से ई-रिक्शा फाइनेंस कराया। कभी साइकिल तक को हाथ न लगाने वाली रानी ने देवर से ई-रिक्शा चलाना सीखा। आत्मविश्वास बढ़ा तो बाद में स्कूटी चलाना सीखी। गाजियाबाद, मुरादाबाद स्कूटी से आती-जाती हैं। आज रानी का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा हुआ है। जिसकी बदौलत आज रानी ई-रिक्शा की एजेंसी व सर्विस सेंटर चला रही हैं। जबकि देवर, एक कारीगर व एक युवती दुकान पर रहते हैं।

वास्तव मे देखा जाय तो रानी के लिए यह मुकाम हासिल करना आसान नहीं था। बेहद संघर्षों के उपरांत ही रानी नें अपना मुकाम तय किया है। रानी उन लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है जो जीवन मे थोड़ी सी कठिनाइयों पर हार मान लेते हैं। शरदीय नवरात्रि प्रराम्भ हुये छ: दिन हो गये है। नवरात्रि के छटवें दिन ये आलेख रानी मैसी के साहस, संघर्ष और हौंसलो को एक छोटी सी भेंट …

साभार!
( उक्त आलेख मेरे मित्र और जनसरोकारो की पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ Ganesh Pandey जी की रानी से बातचीत पर आधारित)

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