सदियों पुराने मनोरंजन के ये साधन, फिर लुभा रहे हैं पहाड़ के लोगों को!

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आज टेलीविजन, इंटरनेट और मनोरंजन के दर्जनों साधनों की उपलब्धता के बाद भी एक बार फिर पहाड़ के लोग सदियों पुराने मनोरंजन के साधनों की ओर मुड़ रहे हैं। मनोरंजन की इन परम्परागत विधाओं से यहां के निवासियों की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भूख और आवश्यकता की पूर्ति तो होती ही है, साथ ही मनोरंजन भी होता है।

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के सीमांत गांव केड़ा (चन्द्रनगर) के साथ ही अनेक गांवों में इन दिनों पांडव नृत्य का आयोजन हो रहा है। कई गांवों में ये आयोजन 30 से अधिक सालों के बाद हो रहे हैं।

बताया जाता है कि जाड़ों के मौसम में पहाड़ में खेती-किसानी नहीं होने से आम-जनमानस फुर्सत में होता है। इन त्यौहारों के बहाने बहन-बेटियां भी मायके आती हैं। पांडव नृत्यों का आयोजन 21 से लेकर 45 दिन तक का होता है। उत्तराखंड में केदारनाथ से लेकर हर मंदिर से पांडवों से जुड़ी कथाएं प्रचलित हैं।

यहां के स्थानीय निवासी पांडवों की देवताओं के रूप में पूजा करते हैं। पांडव नृत्यों के आयोजन में पांडव आवेश में परम्परागत वाद्य यंत्रों की थाप और धुनों पर नाचते हैं। पांडव नृत्य में युद्ध की सदियों पुरानी विधाओं जैसे चक्रव्यू, कमल व्यू, गरुड़ व्यू, मकर व्यू आदि का भी आयोजन होता है। रात्रि में पांडव लीला के आयोजन में महाभारत की कथाओं का मंचन भी होता है।

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