श्रद्धांजलि! राजधानी गैरसैण बनाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी को शत शत नमन।

संजय चौहान

गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने को लेकर अपने प्राणों को त्यागने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी को शत शत नमन।गौरतलब है की राज्य की स्थायी राजधनी गैरसैंण बनाने और राज्य का नाम उत्तराखंड करने सहित पांच मांगों को लेकर 2 जुलाई 2004 से बेनीताल, आदिबद्री में आमरण अनशन में बैठने के 38 दिन बाद बाबा मोहन उत्तराखंडी ने 9 अगस्त 2004 को कर्णप्रयाण के सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया। गैरसैंण को राजधानी बनाने की इतिहास में अपना नाम अमर कर गये। चांदकोट क्षेत्र, जनपद पौड़ी के ग्राम बठोली में मनवर सिंह नेगी के घर 1948 में जन्में मोहन सिंह नेगी बचपन से ही जनूनी तेवरों के लिये जाने जाते रहे। इंटरमीडिएट और उसके बाद आईटीआई करने के पश्चात उन्होंने बंगाल इंजीनियरिंग में बतौर क्लर्क नौकरी की शुरुआत की। सेना की नौकरी उन्हें ज्यादा रास नहीं आयी। वर्ष 1994 में उत्तराखंड आंदोलन के ऐतिहासिक इदौर में बाबा ने सक्रियता से हिस्सेदारी की। दो अक्टूबर 1994 में मुजफरनगर कांड के बाद बाबा ने आजीवन दाड़ी-बाल ने काटने की शपथ ली। उसके बाद मोहन सिंह नेगी बाबा उत्तराखंडी के नाम से प्रसिद्ध हो गये। उत्तराखंड राज्य निर्माण में खुद को अर्पित करने वाले बाबा उत्तराखण्डी अपनी मां की मृत्यु पर भी घर नहीं गये। उन्होंने अपन दाड़ी-बाल भी नहीं कटवाये। राज्य आंदोलन और जनता की लड़ाई में लग बाबा को अपने घर में तीन बच्चों और पत्नी की ममता भी नहीं डिगा पायी। उनके तीन बच्चे सुनीता, यशोदा और शैलेन्द्र हें। पत्नी का नाम कमला है। बाबा का उत्तराखंड की जनता के लिये लंबा संघर्ष रहा। वे गैरसैंण को राजधनी बनाने और विभिन्न क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर अनशन में बैठे।

– 11 जनवरी 1997 को लैंसडोन के देवीधार में उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिये अनशन।
– 16 अगस्त 1997 से 12 दिन तक सतपुली के समीप माता सती मंदिर में अनशन।
– 1 अगस्त 1998 से दस दिन तक गुमखाल ;पौड़ी में अनशन
– 9 फरवरी से 5 मार्च 2001 तक नंदाढोक ;गैरसैंण में अनशन।
– 2 जुलाई से 4 अगस्त 2001 तक नंदाढोक ;गैरसैंण में राजधानी बनाने के लिए अनशन।
– 31 अगस्त 2001 को पौड़ी बचाओ आंदोलन के तहत अनशन।
– राजधानी गैरसैंण के मुद्दे पर 13 दिसंबर 2002 से फरवरी 2003 तक चैंदकोट गढ़ी ;पौड़ी में अनशन।
– 2 अगस्त से 23 अगस्त 2003 तक कनपुर गढ़ी ;थराली में अनशन।
– 2 फरवरी से 21 पफरवरी 2004 तक कोदिया बगड़ ;गैरसैंण में अनशन।
– 2 जुलाई से 8 अगस्त 2004 तक बेनीताल ;आदिबदरी में अनशन।

– अखिरकार राजधानी के लिये संषर्ष करते हुये 9 अगस्त 2004 को उन्होने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। राजधानी के लिए बाबा मोहन उत्तराखंडी की सहादत को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। आपको शत शत नमन।

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