उत्तरकाशी: भव्यता और दिव्यता का अदभुत संगम

 

 

चन्द्रभूषण बिजल्वाण

 

काशी नाथ की स्थली है उत्तरकाशी

भागीरथी गंगा का मायका, भगवान शिव की तपोस्थली, आस्थावानों, श्रद्धावानों के लिए कण्डार देवता, कपिलमुनि, जमद्ग्नि ऋषि, रेणुका माँ, भगवान विश्वनाथ, प्रकृति प्रेमियों के लिए द्यारा बुग्याल, केदारकांठा, हरकीदून, पुष्टारा, डोडीताल, सरूताल हिमाच्छादित, पर्वतमालाऐं, लम्बे-चैडें़ बुग्याल विशालकाय देवदार, खिर्सू, मोरू के वन इन की गोद में हर्षिल, बंगाण, पर्वत सेवरी के सेब, राजमा, चैलाई, आलू, मटर व रामासिरांई के लाल चावल व नकदी फसलें लहलाती हैं। तो दूसरी ओर यहां के सून्दर स्त्री पुरूष महिलाऐं युवक युवतियां सेलकु मेला, लोसर मेला, वरूणी मेला, माघ मेला, जागरों, विष्वत् संक्राति, सरनोल मेला, देवलांग, मोल्टाडी मेला रामासिराई के श्रावण के मेलों त्यौंहारों के अवसर पर तांदी रासो नृत्य करते हुए पंक्तिबद्ध अपने पारम्परिक वेषभूषा का दृष्य देखते ही बनते है। ऐसे ही और न जाने कितने ही नयनाभिराम कर देने वाले प्राकृतिक दृष्यों, सांस्कृतिक मेलों, देवी-देवताओं, त्यौहारों, पर्वो में आस्था व विश्वास रखने वाले जनपद का नाम ही उत्तरकाशी है।
माँ भागीरथी गंगा का उद्गम भी उत्तरकाशी के माथे पर विराजमान है। माँ का आशीष प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप् से सदैव ही यहां के जनमानस पर बना रहता है। तभी तो चाहे उत्तर-प्रदेश हो या वर्तमान उत्तराखण्ड जिस पार्टी का विधायक उत्तरकाशी जनपद या गंगोत्री विधानसभा से निर्वाचित होकर आया राज्य में उस पार्टी की सरकार बनती आयी है। आखिर है, न माँ की कृपा?

उत्तरकाशी जनपद का उद्भव- पहले उत्तरकाषी टिहरी रियासत का एक भाग हुआ करता था जो टिहरी रियासत 1949 को स्वतंत्र भारत में विलय होने के पश्चात 24 फरवरी 1960 को टिहरी जनपद से पृथक होकर उत्तरकाशी नाम से अलग जनपद स्थापित हुआ। जनपद मुख्यालय का प्राचीन नाम ‘‘बाडा़हाट’’ था। यहां पर तिब्बत से व्यापारी औषधि, जड़ी-बूटी, खाद्य सामग्री ऊनी वस्त्र आदि लाते थे। जिन्हें खरीदने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और यहां पर बड़ा बाजार लगता था जिस कारण यहां का नाम बाड़ाहाट पड़ा। शिवप्रसाद डबराल से हाट शब्द का अर्थ राजधानी दिया है। सातवीं शताब्दी में ह्वेन्सांग ने इसे ब्रहमपुर राज्य की राजधानी के रूप में बताया, यहां पर भागीरथी उत्तरवाहिनी हो जाती है। जिस कारण इसका नाम उत्तरकाशी पड़ा। ग्रथों में उत्तरकुरू के समय के रीति-रिवाज व पहनावे की छाप आज भी ग्रामीण अंचलों में देखने को मिलती है लोगों का मत है कि यहां पर वैदिक भाषा अच्छी तरह से बोली व समझी जाती थी।जिस कारण बाहर से लोग यहां पर बोली सीखने आते थे पुराणों में इसे सौम्यकाशी भी कहा गया है, परषुराम ने अपनी मां रेणुकादेवी से पूछा था, कि पिताजी ने मरते समय क्या कहा था? रेणुका माँ ने कहा कि उन्होंने 21 बार हथेली से पृथ्वी का ताड़न किया था। परषुराम ने इसे सुनकर 21 बार क्षत्रियों का संहार करने कि प्रतिज्ञा की और भगवान विश्वनाथ  शिव से शत्रुओं पर विजय पाने का वर मांगा सबसे पहले कार्तवीर्य को मार डाला और शान्त होकर क्रोध और शस्त्रों का त्याग कर सौम्यभाव धारण कर लिया इस लिए इस स्थान को सौम्यकाशी भी कहा जाता है। यहां पर परषुराम मन्दिर भी विद्यमान है।
उत्तरकाषी को उत्तराखण्ड में दूसरे काशी के नाम से भी जाना जाता है। जो घाट मन्दिर तीर्थ वाराणसी में हैं वे सब उत्तरकाशी में विद्यमान हैं। वरूणा और अस्सी नदियों के बीच बसी यह काशी मणिकर्णिका घाट जिस पर पितृों को तर्पण देने से पितृ सौ कल्प तक तृप्त रहते हैं। केदारघाट बाबा विष्वनाथ मन्दिर केदार नाथ मन्दिर शक्ति मन्दिर के बारे में बाड़ाहाट में चैथी शताब्दी से लेकर 21वीं शताब्दी तक नागवंष का अधिकार रहा जो शक्ति मन्दिर में अंकित है।
उत्तरकाषी का ऐतिहासिक परिचय- महाभारत के युद्ध के पश्चात इस क्षेत्र में नाग किरात खस आदि जातियां व्याप्त रही जो कुषाण काल में कुषाण के अधीन रही। कुषाण काल के उपरान्त कत्युरी वंष का इस क्षेत्र से सम्बन्ध रहा। 634ई. में ह्वेन्सांग ने इस क्षेत्र का भ्रमण किया सातवीं शताब्दी से कत्युरी शासकों ने गढ़वाल, कुमांऊ में राज किया। इस वंष का अन्तिम राजा भानु प्रताप 52 गढ़ों वालों में सबसे प्रमुख थे। इनकी 2 कन्याएं थीं। जिनमें से एक का विवाह गुजरात धारा नगरी से आने वाले पंवार वंषी कांदिलराव के पुत्र कनक राव से विक्रमीं संवत् 745 में भानु प्रताप पाल के साथ हुआ। चांदपुर गढ़ के सिहांसन पर बैठने के बाद कनक पाल से प्रसिद्ध हुए इसी राजवंश ने गढ़वाल क्षेत्र में राज किया। जिनका कनकपाल (745-756) से लेकर अजय पाल (1415-1446) पंवार राजाओं तथा अजय पाल (1490-1519) के पद्युमन शाह (1786-1804) पुर्नस्थापना गोरखा आक्रमण के पश्चात (1815-1859) से लेकर मानवेन्द्र शाह (1946-1949) अगस्त तक राज किया अगस्त 1949 को टिहरी रियासत स्वतंत्र भारत में विलय हो गयी। इसके पश्चात् 24 फरवरी 1960 को उत्तरकाषी पृथक जनपद के रूप् में अस्थित्व में आया उस समय 4 तहसीलें भटवाड़ी, डंूडा राजगढ़ी (बड़कोट) व पुरोला तथा वर्तमान में मोरी व चिन्यालीसौड़ को भी तहसील का दर्जा मिल चुका है। जिससे वर्तमान में 6 तहसीलें व 6 विकासखण्ड हैं। नाकरी के समीप माँ रेणुका देवी का मन्दिर है महाभारत में मिले वृतान्त के अनुसार महान सन्त जड़ भरत ने उत्तरकाशी में तपस्या की जिनका मन्दिर प्रतीक के रूप् में उत्तरकाशी में विद्यमान है। यहाॅ पर वरूणावत पर्वत है। भागीरथ ने गंगोत्री में तपस्या की वह शील आज भी (भागीरथशीला के नाम से प्रसिद्ध) हैं, रैथल में राणा गम्भीरू का बहुमंजिला भवन तथा तिलौथ में नरू-बिजोला का प्रचीन भवन आज भी विद्यमान है। 1980 की बाढ़, 1990 का प्रलंयकारी भूकम्प, 2004 का वरूणावत के कहर का उत्तरकाशी भी इतिहास की गवाह बनी है।

धार्मिक महत्व- उत्तरकाशी जनपद को दो धामों गंगोत्री व यमुनोत्री का गौरव प्राप्त है। गंगा का उद्गम गोमुख जो गंगोत्री से 18 किमी0 दूर है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु मोक्षदायिनी माँ गंगा की पूजा अर्चना करने यहां पहुंचते हैं, गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने गोरखा आक्रमण के बाद यहां पर गंगा मन्दिर का निर्माण करवाया था। वर्तमान में यह अस्तित्व में नहीं है। इस समय यहां विशाल व भव्य मन्दिर है जिसका निर्माण जयपुर के राजा ने करवाया था। यहां पर भागीरथ ने तपस्या कर गंगा को स्वर्ग से उतारने का सफल प्रयास किया था। यहीं पर पिण्डदान आदि कर्म किये जाते है। गंगा मन्दिर में भगवती गंगा माँ लक्ष्मी अन्नपूर्णा जाह्नवी, यमुना, सरस्वती, भगीरथ व शंकराचार्य की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। यहीं पर यात्री गंगा जी में स्नान करते हैं और गंगा जल बोतलों में भरकर अपने-अपने घरों में ले जाते हैं। इस पवित्र जल में कई वर्षों तक दुर्गन्ध व कीड़े नहीं पड़ते हैं। यहां से थोड़ा नीचे गौरी कुण्ड है कहा जाता है कि यहां पर पार्वती ने  शिव को प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी यहां पर प्राकृतिक शिवलिंग है। जिस पर गंगा प्रपात बनकर गिरती हैं। भैरव घाटी में जाहनवी को पार कर भैरव का मन्दिर है जो गंगोत्री का रक्षक देवता कहा जाता है। यहां से उत्तरकाशी की ओर उतरने पर हर्षिल मनमोहक रमणीक स्थल है, जो सेब के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर विलसन का बंगला है जिसमें अब वन विश्राम गृह बना है। नीचे उतरने पर गंगनानी में गंधक के गर्म जल के कुण्ड है जिसमें यात्री स्नान करते हैं। भटवाड़ी मनेरी भाली से होते हुए उत्तरकाशी उत्तराखण्ड की दूसरी काशी में वरूणा और अस्सी नदियों के मध्य पांच कोष में फैला है। यह भव्य तीर्थस्थल ब्रहमकुण्ड, रूद्रकुण्ड, रूद्रेष्वर, वरूणेश्वर, विष्णुकुण्ड, वरूणावत, लक्षागृह और राजेष्वरी, विषेष्वर, पंचकोषी विष्वनाथ मन्दिर, शक्तिमन्दिर, हनुमान मन्दिर, गोपाल मन्दिर श्री काली सत्यनारायण मन्दिर, राम मन्दिर, एकादष रूद्रेष्वर मन्दिर, अम्बा देवी मन्दिर, अन्नपूर्णा मन्दिर, सहित् 100 से अधिक मन्दिर आज भी विद्मान हैं।

यदा पापस्य बाहुल्यं यवनाक्रांत भूतलम्।
भविष्यति तदा विप्रा निवासं हिमवद्गिरौ।।
काश्या सह करिष्यामि सर्वतीर्थेः समन्वित।
अनादि सिद्वं में स्थानं वर्तते सर्वदेवहि।।
काष्यां हि यानि तीर्थानि तानि सर्वाणि तत्र हि।।

अर्थात जब कलियुग में यवनों से भू-मण्डल अक्रांत होगा मेरा निवास हिमालय पर होगा। यहां काषी तथा अन्य समस्त तीर्थीं के साथ मैं निवास करूंगा, जो तीर्थ काशी  में हैं वे सभी यहां भी हैं।

जनपद मुख्यतः दो भागों में रवांई घाटी व गंगाघाटी के रूप् में विभक्त है राड़ी की पर्वतमाला भौगोलिक दृष्टि से दो भागों में बांटती है। जहां गंगा घाटी में गंगोत्री, विष्वनाथ मन्दिर, रेणुकादेवी मन्दिर, कण्डारदेवता, माँ भगवती सहित अपने-अपने ईष्ट देवी-देवताओं के मन्दिर लगभग सभी गांवो में है। वहीं रवांई घाटी में स्थापत्य कला वास्तुकला की दृष्टि से यहां के छत्रसैली के मन्दिर बहुमंजिले भवनों के अद्भुत कलाकृतियाॅ यहां आने वालों को आष्चर्यचकित कर देते हैं। यमुनोत्री में माँ यमुना का मन्दिर जो भक्त यहां सच्चे मन से स्नान व पूजा करते हैं उनको समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। खरसाली गांव में यमुना व जानिमहाराज का प्राचीन मन्दिर है। जो कई विनाशकारी भूकम्पों को झेल चुका है। कई वर्षों से कुछ झुका हुआ है लेकिन फिर भी अभी तक ज्यों का त्यों खड़ा है। यह अक्षय तृतीय को अपनी बहन यमुना को छोड़ने यमुनोत्री जाते हैं। भाई-बहन का रिष्ता आज भी यहां पर कायम है। थान गांव में जमद्ग्नि ऋषि का मन्दिर है, यहीं पर कल्प वृक्ष का पेड़ है जो अब समाप्ति की कगार पर है। सरनौल में रेणुका देवी का मन्दिर है, बनाल-पुजली, गैर में राजा रघुनाथ का पैगोड़ा शैली का मन्दिर हैं। तो वहीं पौन्टी व मोल्डा में माँ भद्रकाली के मन्दिर हैं। बड़कोट में चन्द्रेश्वर महादेव, भाटिया में बौखनाथ देवता का मन्दिर, देवराणा में देवदार के जंगलों के बीच एक भव्य रूर्देष्वर महादेव का मन्दिर है। तो वहीं गुन्दियाटगांव में कपिलमुनी, पुजेली में रघुनाथ तथा कमलेष्वर में भगवान आषुतोष का तथा मोरी विकासखण्ड में हनोल (देहरादून) व ठड़ियार में महासू देवता के भव्य मन्दिर हैं जहां सदैव भक्तों का तांता लगा रहता है। वहीं नेटवाड़ में न्याय के देवता पौखू महाराज का मन्दिर है। देवरा में कर्ण महाराज पंचगांई पट्टी में सोमेष्वर महादेव व फते पर्वत पट्टी में सुडकुडिया महासू के भव्य मन्दिर हैं। सम्पूर्ण जनपद में आस्था व विष्वास के अनेकानेक मन्दिर हैं।जिन्हें यहां के श्रद्धावान लोग पूर्ण आस्था व विष्वास के साथ मानते पूजते हैं।

पर्यटक स्थल- उत्तरकाशी जनपद दर्षनीय एंव सांस्कृतिक धरोहर का अद्भुत खजाना है। हिमाच्छादित पर्वत मालाऐं इनसे निर्झर झरते झरने कल-कल निनाद करती सरिताएं कलरव करती पशु-पक्षी लम्बे चैड़े मखमली बुग्याल विशालकाय देवदार, खरसु, मोरू, बांज, चीड़ के वनों से आच्छादित चोटियां भोजवृक्ष ठेलू, सिमलू की छोटी-छोटी झाड़ियों को छोड़ते हुए लम्बे-चोड़े बुग्याल जहां जुलाई से सितंबर तक बड़ी-बड़ी बगीया रंग-विरेगी पुष्पों से खिलकर पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करते हैं। द्यारा बुग्याल, तपोवन, नन्दन वन, डोडीताल, केदारताल, नचिकेताताल, सरूताल, भ्रराड़सर ताल, पुष्टारा, सुतणी, मानेराकांठा, केदारकांठा, चांगसील देवक्यारा, हरकीदून सहित कई पर्यटक स्थल व ताल हैं। जहां पर्यटक खिंचे चले आते है। पर्यटाको एवं पर्वतारोहियों के लिए पर्वतारोहण हेतु लदाड़ी में एनआईएम संस्थान है। संस्थान द्वारा देष-विदेष के युवक-युवतियों को पर्वतारोहण के बेसिक व एडवान्स प्रषिक्षण प्रदान किये जाते है, इस संस्थान से एडवान्स प्रषिक्षण प्राप्त कर उत्तरकाषी जनपद की ग्राम नाकुरी की कुमारी बछेन्द्री पाल ने संसार की सबसे ऊँची चोटी माउण्ड एवरेस्ट पर विजय प्राप्त कर प्रथम भारतीय एवरेस्ट महिला विजेता के रूप में ख्याति प्राप्त कर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवाया है।

सांस्कृतिक धरोहर का जनपद है उत्तरकाशी- हिमालय की गोद में निवास करने वाले विभिन्न समुदाय अपने तीज-त्यौहार, उत्सव मेलों की सांस्कृतिक भावनात्मक एकता से जुड़े रहते हैं। यहां की संस्कृति, लोककला, लोकनृत्य, लोकगीत, लोककथाऐं पर्वतीय जनमानस की सहजता, सरलता, वीरता व ईमानदारी को परिलक्षित करती हैं। गंगा-यमुना की पावन धारा धर्म, संस्कृति, पर्यटन की प्रसव भूमि रही है। हरी-भरी वनस्पतियों से आच्छादित हिम षिखर लम्बे-चैड़े बुग्याल रंग-बिरगें पुष्प् उनके मध्य श्वेवेतवर्णीय कल-कल निनाद करती सरिताऐं व ऊँचे झरनों के प्रक्षालन से पवित्र होती उत्तरकाषी जनपद की आस्थावान प्रकृति सदैव देषी-विदेषी जनों को आकृर्षित करती रही हैं। यही वह दृष्य हैं जो मानव को झंकृत कर गुनगुनाने के लिए मजबूर कर देते हैं। चाहे महात्मा गांधी जी हो या सुमित्रा नन्दन पन्त जैसे मनीषियों को भी नित्य होने वाले हिमालय दर्षन से ही लिखने की प्रेरणा मिली है। पहाड़ के लोकगीत हों या लोकनृत्य इन्हीं में यहां की महान संस्कृति रचि बसी है। यहां के मेलों, जागरों, त्यौहारों के अवसर पर यह सांस्कृतिक भाव भंगिमाएं लोकगीतों, लोकनृत्यों द्वारा सरल व सौन्दर्य से भरे हृदयों का उद्गार बनकर अवतरित होते हैं। यहां के जनमानस के नृत्य हाव-भावों व मुद्राओं में जनसाधारण का सरल सुमधुर भावों के स्वरों का सागर लहराता है। यही कारण है, कि पर्वतीय क्षेत्रों में यहां की सांस्कृति झलक अपनी अलौकिक छाप छोड़ती है। यहाॅ के लोकगीतों व नृत्यों में निम्नलिखित गीत व नृत्य प्रसिद्ध हैं-

पाण्डव नृत्य- यह नृत्य महाभारत के प्रसंगों पर आधारित होता है और ढोल-नगाड़ों रणसीघों की सुमधुर ताल के साथ ही यह नृत्य गतिमान होता है पांच पाण्डवों के पात्र इस नृत्य में भाग लेते हेै। यह नृत्य पंचगाॅई पट्टी को छोड़कर जनपद में लगभग सभी गावों में होता है।

 

रासो नृत्य- यह श्रृंगारिक नृत्य है इस में ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित गीत भी गाये जातें हैं।

ताँदी नृत्य- यह नृत्य ढोल-दमांऊ, रणसीगें के लय ताल के साथ स्त्री-पुरूषों द्वारा संगीत के साथ एक गोलघेर में किया जाता है। रवांई क्षेत्र में यह बहुत प्रचलित नृत्य है। यह नृत्य कई-कई दिनों तक मेलों व त्यौहारों के अवसर पर चलता है।

चैपती नृत्य- दो-दो के जोडे़ में यह नृत्य होता है।

पावड़ा- स्थानीय वीर व्यक्तियों की याद में प्रषंसा के रूप में पावड़ा गाया जाता है।

जागर- कुल देवताओं की आत्माओं को खास व्यक्तियों पर अवतरित कर दुःख कष्ट निवारण के बारे में उपाय ज्ञात करते हुये अनुष्ठान के रूप में किया जाता है।

जंगबाजी- दो व्यक्तियों द्वारा तलवार ढाल लेकर रणकौषल को ढोल-नगाड़ों की लय पर प्रदर्षित करते हैं। इसके अतिरिक्त डोली नृत्य पैंसारा आदि नृत्य बड़े हर्षोलाष के साथ यह नृत्य विभिन्न मौकों पर होते हैं।

 

मेले एवं त्यौहार- जनपद में एक सप्ताह तक माघ मेला जिला मुख्यालय पर आयोजित होता है, जो मकर संक्राति से कण्डार देवता के नेतृत्व में सात दिनों तक चलता है। इस अवसर पर सांस्कृतिक गतिविधिया एवं विभिन्न विभागों द्वारा गतिविधियों की जानकारी प्रदान की जाती है, अब यह मेला विकास मेले के रूप में मनाया जाता हैं।

सेल्कू मेला- भादों माह में हर्षिल, मुखवा व झाला में यह मेला अपने पारम्परिक वेषभूषा में दो दिनों तक चलता है। रवाई में मेले ज्येष्ठ मास से प्रारम्भ हो जाते हैं। जो पेरे सावन व भादों तक मेलों व थोलों व जागरों के रूप में मनाये जाते हैं। जिनमें रेणुका देवी मेला, सरनौल, मोल्टाड़ी मेला, देवराणा, पौखू देवता, श्रावण में रामासिराई रामा, पोरा, कण्डियाल गाॅव, गुन्दियाटगाॅव में मेलों का आयोजन होता है। भादों में हनोल, ठडियार, दौणी, नैटवाड, खरसाड़ी आदि गाॅवों में जागरें मानये जाते हैं। इस अवसर पर रात-भर तान्दीगीतों व नृत्य का आयोजन किया जाता है। दौणी में यह मेला तीन दिन तथा तीन रातों तक अविरल चलता है। यहां का मुख्य आर्कषण अवतरित् पश्वा रस्से पर निकलता है, और हाथ छोड़कर रस्से पर घुमता है। रामा में भादों में थोले होते है। जिसमें अवतरित पश्वा अपने गाल में सुआ डालता है, इसे डालने पर किसी प्रकार का न घाव व न ही खून निकलता है। देवष्ठनी में छठ मनायी जाती है, कर्ण महाराज के मन्दिर देवरा गांव में गेंद का मेला मकर संक्राति के दिन मनाया जाता है। पंचगाॅई पट्टी में सोमेष्वर देवता के मेेले कई दिनों तक विभिन्न गांवों में चलते हैं। षिवरात्री में कमलेष्वर मन्दिर पुरोला व विष्वनाथ मन्दिर उत्तरकाशी, चन्द्रेष्वर मन्दिर बड़कोट सहित सभी  शिव मन्दिरों में मेला लगता है। रंवाई का सबसे प्रसिद्ध मेला देवलांग बहुत प्रसिद्ध है। जो मार्गशीर्ष की अमावस्या को गैर-बनाल के पैन्तालीस (45) गांव के लोग बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इसके अलावा रक्षा-बन्धन, जन्माष्टमी, (आठाई) दुर्गा नवरात्री, दीपावली तथा पौष के त्यौहारा मरोज, बसन्त पंचमी, फुल्यारी, नववर्ष, वैषाखी पर रवाई में ठोउडा (विषू मेला) मनाया जाता है। ज्येष्ठ संक्राति को बाकरीया संक्रात मनायी जाती है। इस प्रकार हम देखते है, कि उत्तरकाशी जनपद व रवाई में बारह माह के बारह त्यौहार बड़े हर्षोंल्लास के साथ मनाये जाते हैं।

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