हिमालय की परम्परागत उद्यमिता को आगे बढ़ाते ‘वैद्य पोखरियाल बंधु’

अरुण कुकसाल

यशस्वी पारंपरिक वैद्य रामकृष्ण पोखरियाल

पौड़ी (गढ़वाल) जनपद के घुड़दौड़स्यूं पट्टी का एक गांव है ‘पोखरी’। पोखरी गांव की प्रसिद्धि यहां प्रतिष्ठापित ‘हरियाली देवी’ के प्राचीन मंदिर के कारण रही है। ‘हरियाली देवी’ प्रमुखतया घुड़दौड़स्यूं एवं विडोलस्यूं क्षेत्र के निवासियों की इष्टदेवी है। पोखरी गांव के ऊपरी भाग हरियालीसैंण (समुद्रतल से 1830 मीटर ऊंचाई) में देवी का भव्य मंदिर है। बांझ-बुरांश के जगंलों के बीच 1 किमी. के हरे-मखमली बुग्याल के बीचों-बीच हरियालीसैंण से हिमालय की एक-एक चोटी को देख और गिन कर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है।

हरियालीसैंण से लगा पोखरी का ही तोक गांव दुर्गापुर है। मैं आपसे इसी दुर्गापुर की बात करना चाहता हूं जो कि आज की तारीख में एक परिवार की 4 पीढ़ियों के सामुहिक उद्यमशीलता का सफलतम जीवंत उदाहरण है।
दुर्गापुर की उद्यमिता की कहानी को जानने-समझने के लिए फिर इतिहास में चलते हैं। पोखरी गांव की पहचान हरियाली देवी मंदिर के अलावा विगत 20वीं सदी तक उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध वैद्य गांवों में भी थी। वैद्य विद्या के साथ ज्योतिष ज्ञान में भी यहां लोग पांरगत थे। विद्वान लेखक महीधर बड़थ्वाल की सन् 1950 में प्रकाशित पुस्तक ‘गढ़वाल में कौन कहां’ में पोखरी गांव के वैद्य दुर्गादत्त पोखरियाल और उनके सुपुत्र बास्वानंद पोखरियाल का जिक्र प्रमुखता से किया गया है। वैद्य दुर्गादत्त पोखरियाल ने लगभग 150 वर्ष पूर्व पोखरी गांव के निकट ही एक विस्तृत भू-भाग पर जड़ी-बूटी के कृर्षिकरण का कार्य प्रारम्भ किया था। उस जमाने में यह एक अभिनव कार्य था। तब औषधीय जड़ी-बूटियों को प्रायः जगंलों से ही लाया जाता था। वैद्य दुर्गादत्त का जड़ी-बूटियों के कृषिकरण के कार्य को उनके सुपुत्र वैद्य बास्वानंद ने आगे बढ़ाया। वैद्य बास्वानंद अपने समय के लोकप्रिय एवं कारगर वैद्य माने जाते थे। उन्हें राजवैद्य का सम्मान प्राप्त था। वैद्य बास्वानंद के बाद उनके सुपुत्र चिंतामणी, अमरदेव और राजाराम पोखरियाल ने वैद्य विद्या को सीखा और नौकरी के साथ-साथ उसे जीवकोपार्जन का मजबूत आधार बनाया था।

वर्तमान में पोखरीगांव का यह हिस्सा इसके संस्थापक दुर्गादत्त पोखरियाल के नाम पर दुर्गापुर कहा जाता है। समुद्रतल से 1825 मीटर ऊंचाई पर 10 हैक्टर क्षेत्र (500नाली) में फैले इस बगीचे में हिमालय में उगने वाली अधिकांश औषधीय, सुंगधीय, फलदार पेड़-पौंधों, फूलों एवं सब्जियों की भरपूर उपस्थिति है। परम्परागत ज्ञान एवं आधुनिक तकनीकी की साझी सक्रियता के सकारात्मक परिणामों को यहां देखा, समझा, सीखा और महसूस किया जा सकता है।

दुर्गापुर के इस बगीचे का वर्तमान स्वरूप वैद्य एवं शिक्षक रहे स्व: राजाराम पोखरियाल जी ने विकसित किया। जिसका वर्तमान स्वरूप उनके सुपुत्र वैद्य रामकृष्ण पोखरियाल एवं वैद्य सुरेश पोखरियाल के सम्मलित प्रयासों का परिणाम है। 4 चैकों में फैले दुर्गापुर के बगीचे में प्रमुखतया तेजपत्ता (3 हजार), अखरोट (300), रीठा (500), ऐलोवेरा (200), बकायन (2 हजार), आंवला (10 हजार), हरड़ (200), बहेड़ा (250), खसखस (5 हजार), लेमनग्रास (50 हजार), बेल (15 हजार) आदि के पौंधे विराजमान हैं। इसके अलावा कुटकी, बज्रदंती, काला जीरा, वन ककड़ी, सोमलता, अतीस, सोमाया, मंडूकपर्णी, सफेद मूसली, पथरचूर, वन अजवाइन, कलिहारी, थुनेर, सालम मिश्री, चोरु, जटामासी, अंगोड़, तिमूर, ब्राह्मी, किल्मोडा, चिरायत्ता, गिलोय, धिंधोरा, खजूर, हर्बल चाय, पपीता, आम, आवंला, शहतूत, नाशपाती, अंगूर, आडू, किन्नो, संतरा, नीबूं, हल्दी आदि अनेकों पेड़-पौधों एवं वनस्पतियों को यहां आधुनिक तरीकों से उगाया जा रहा है। उत्पादित जड़ी-बूटियों का प्रसंस्करण करके उनसे कई आर्युवेदिक दवाईयों का निर्माण वैद्य पोखरियाल बंधुओं द्वारा किया जाता है। जिनकी आपूर्ति पूरे देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों की मांग के अनुसार की जाती है। जड़ी-बूटी के साथ-साथ खेतों में परम्परागत फसलों को आधुनिक तौर-तरीके से उगाने का हुनर यहां देखा और सीखा जा सकता है। राजमा, तोर, गहथ, भट्ट, कोदा, झंगौरा, मक्का, सोयाबीन आदि की पैदावार भी इसी बगीचे में होती है। साथ ही जैविक सब्जी उत्पादन में मटर, मिर्च, ककड़ी, गोभी, मूली, बैंगन, भिंडी, फरासबीन, लौकी, करेला, गोदडी आदि की भरपूर फसल 2 बड़े पोलीहाउस की मदद से की जाती है। पानी की व्यवस्था के लिए हर चैक में प्राकृतिक तौर पर वाटर टैंक बनाये गये हैं। जिसमें सालभर में हुयी वर्षा का पानी स्वतः ही जमा हो जाता है। यहां उत्पादित सब्जियां स्थानीय बाजारों आसानी से बिक जाती हैं। अभी हाल ही में फूलों की खेती की ओर भी पोखरियाल बंधुओं ने कदम बढ़ाये हैं।

वैद्य पोखरियाल बंधु विभिन्न अवसरों पर उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित हुए हैं। वर्ष 2007 में हर्बल उत्पाद के क्षेत्र में राज्यस्तरीय उत्कृष्टता पुरुस्कार उन्हें प्राप्त हुआ है। वैद्य रामकृष्ण पोखरियाल सोशियल मीडिया के माध्यम से आम लोगों को आयुर्वेद के बारे बहुउपयोगी जानकारी देकर जन-जागरूकता के कार्य में लगे हैं।यह विश्वास है कि उनके इस महत्वपूर्ण कार्य को उनकी नयी पीढ़ी सफलता के ऊंचे मुकाम की ओर ले जायेगी। यह कहना समीचीन होगा कि पोखरियाल बन्धुओं के जैसे उद्ममीय हौसलों से ही उत्तराखंड समृद्ध होगा वरना बाकी तो बस, कहने-सुनने की ही बातें हैं।

 

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