क्या है दल-बदल कानून और कैसे लटकी बागी विधायकों पर तलवार?

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harak-harish-rawat-ramesh-pokhariyalउत्तराखंड में सियासी संकट गहराता ही जा रहा है. कांग्रेस के बागी विधायकों के तेवर को देखकर ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री हरीश रावत को अपनी सरकार बचाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी

कांग्रेस ने भले ही विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को पार्टी से 6 साल के लिए निकाल दिया हो, लेकिन बागी विधायक अपने कदम पीछे करने के मूड में नहीं हैं इन सारे सियासी हालातों के बीच यह सवाल पैदा होता है कि आखिर बागी विधायकों का मकसद क्या है और उनका सियासी भविष्य कैसा होगा? क्या उनकी सदस्यता खत्म हो जाएगी या फिर वो बच जाएंगे? आइए जानते हैं, आखिर क्या है दल-बदल अधिनियमऔर उत्तराखंड के ताजा सियासी परिवेश में यह कानून किस तरह लागू होता है

क्या है दल-बदल कानून?

‘आयाराम गयाराम’ राजनीति समाप्त करने के लिए दल-बदल कानून 8वें लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी सरकार ने 24 जनवरी 1985 को 52वां संविधान संसोधन विधेयक के जरिए लोकसभा में पेश किया था 30 जनवरी को लोकसभा और 31 जनवरी को राज्यसभा में विधेयक पारित राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद दल-बदल अधिनियम अस्तित्व में आया

इसके जरिए अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में बदलाव किया गया संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई दरसअल, 10वीं अनुसूची को ही दल-बदल कानून के तौर पर जाना जाता है यह संसोधन 1 मार्च 1985 से लागू हो गया था

ऐसे जाएगी संसद या विधानसभा की सदस्यता:

संसद या राज्य विधानमंडल सदस्यों की सदस्यता कैसे समाप्त हो, इसकी व्याख्या दल-बदल कानून में स्पष्‍ट रूप से की गई है

(1) कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करे या गैरहाजिर रहे तो सदस्यता जाएगी, लेकिन दल 15 दिन के भीतर सदस्य को माफ करे तो सदस्यता बची रहेगी

(2) यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दें तो सदस्यता जाएगी

(3) कोई निर्दलीय चुनाव के बाद किसी दल में चला जाए तो सदस्यता जाएगी

(4) यदि मनोनीत सदस्य कोई दल ज्वाइंन कर ले तो जाएगी सदस्यता

अपवाद: 1-52वें संविधान संसोधन अधिनियम के पेरा 3 में एक तिहाई का नया दल बनाने की अनुमति थी

2-अधिनियम के पेरा 4 में दो या अधिक दल अपनी सदस्यता के दो तिहाई बहुमत से विलय का अधिकार

3-कोई सदस्य अध्यक्ष के पद पर चुनाव से पहले दलीय निष्पक्षता की दृष्टि से दल से इस्तीफा दे दें

हालांकि, दल-बदल अधिनियम आयाराम गयाराम रोकने के लिए एक अच्छा कदम माना गया, लेकिन पेरा 3 और पेरा 4 ने मकसद को अधूरा छोड़ दिया इसका नतीजा रहा कि 16-दिसंबर-2003 को संसद को 97वां संविधान संसोधन विधेयक पारित करना पड़ा

इस विधेयक में ना केवल व्यक्तिगत बल्कि सामूहिक दल-बदल को भी असंवैधानिक करार दिया गया 97वें संसोधन के जरिए मंत्रीमंडल का आकार भी 15 फीसदी सीमित कर दिया गया हालांकि, किसी भी कैबिनेट सदस्यों की संख्या 12 से कम नहीं होगी इस संसोधन के द्वारा 10 अनुसूची की धारा 3 को खत्म कर दिया गया, जिसमें एक-तिहाई सदस्य एक साथ दल बदल कर सकते थे अब दो-तिहाई से कम सदस्य अपना दल नहीं छोड़ सकते

हालांकि कई बार दल-बदल कानून को अभिव्यक्ति की आजादी के हनन से भी जोड़कर देखा गया लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र के निर्माण में यह कानून में काफी प्रभावी साबित हो रहा है

उत्तराखंड के सियासी संकट में दल-बदल कानून की भूमिका

कांग्रेस के 36 में 9 विधायक बागी रुख अपनाकर भाजपा के पाले में खड़े हो गए है लिहाजा, दल बदल की तलवार उन विधायकों पर लटक गई है स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल ने बागी विधायकों के आचरण को आधार बनाकर दल बदल कानून के तहत सदस्यता खत्म किए जाने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया है बड़ा सवाल है क्या आचरण को आधार बनाकर विधायकों पर इतनी बड़ी कार्रवाई संभव है?

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