एक ऐसा गांव जहां सिर्फ भगवान की कसम दिलवाकर दे देते हैं लोन!

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बैंक से लोन लेना हो या फिर साहूकार से कर्ज, स्टांप पर एग्रीमेंट और कागजों पर इतने हस्ताक्षर कि आपके हाथ दर्द कर जाएं। यह भी तब जबकि आप कुछ न कुछ गिरवी रखेंगे। ऐसे में यह खबर आपको चौंका देगी कि उत्तराखंड के एक गांव के लोग सिर्फ भगवान की कसम दिलवाकर लोन दे देते हैं।

इस गांव के लोगों के लिए भगवान सोमेश्वर की सौगन्ध से बड़ी कोई गारंटी नहीं है। खास बात यह है कि इस गांव में कोई एक-दो नहीं बल्कि कई साहूकार हैं। तभी तो इस गांव को साहूकार गांव या लोन विलेज कहा जाता है।

उत्तराखंड का यह साहूकार विलेज गंगी टिहरी गढ़वाल में है। गंगी गांव के बीचोंबीच भगवान सोमेश्वर का प्राचीन मंदिर है। उधार देने से पहले इसी मंदिर के प्रांगण में एक दिया जलाकर भगवान सोमेश्वर को साक्षी मान उधार दिया जाता है। गंगी गांव के लोगों ने सबसे अधिक धनराशि लोन के रूप में केदारघाटी में दी है।

केदारनाथ से लेकर गौरीकुंड, सोनप्रयाग, त्रिजुगीनारायण, सीतापुर और गुप्तकाशी जैसे बाजारों में सैकड़ों होटल, ढाबे, घोड़े खच्चर और छोटे-बडे व्यवसायी गंगी गांव से उधार लेते आए है। उधार देने की प्रक्रिया भी अजीबोगरीब है। यहां केवल सोमेश्वर भगवान ही गवाह होता है। केदारघाटी ही नहीं बल्कि गंगोत्री और भिलंगना घाटी में भी इस गांव के लोगों ने उधार दिया है।

गढ़वाल के पूर्व कमिश्नर एसएस पांगती कहते है, “पहाड़ के सीमान्त इलाकों में दर्जनों गांव ऐसे हैं, जो घरों में कैश रखते हैं और पैसा उधार देते हैं।” वे बताते हैं कि गंगी गांव के लोग अपराधी नहीं हैं, टैक्स चोरी कर उन्होंने कालाधन एकत्रित नहीं किया है, बल्कि अपनी मेहनत से कमाया है, जिसे वे खुद उधार देते आए हैं।

पहले की बचत, फिर कमाया ब्याज

गंगी गांव के पूर्वज पहले से कम धनराशि में अपना जीवन यापन करते थे। बचत के कारण उनके पास जो धनराशि जमा होता गया, उसे धीरे-धीरे 2 प्रतिशत ब्याज पर देना शुरु कर दिया। यानी 1 लाख पर प्रति वर्ष 24 हजार ब्याज लेते रहे हैं। इसी तरह फिर धीरे-धीरे ये गांव लोन विलेज के रूप में विकसित होता गया। 1970 से 80 के दशक में डीएम रह चुके पूर्व आईएएस एसएस पांगती कहते है कि गंगी गांव की अपनी अर्थव्यवस्था है। टिहरी जिले का गंगी गांव के लोग भले ही प्राचीन समय में केदारघाटी, गंगोत्री और तिब्बत के साथ व्यापार करते थे। गंगी गांव के प्रधान नैन सिंह कहते है कि वे भेड़ पालन, आलू, चौलाई और राजमा को बेचने के बाद जो धनराशि बचाते हैं, उसे ही 2 प्रतिशत ब्याज पर लोन दे देते हैं।

पर्यटन की दृष्टि से भी साहूकार है गंगी गांव 

आप गंगी लोन लेने न सही बल्कि इसे देखने भी आ सकते हैं। घनसाली से करीब 30 किमी की दूरी पर बसा है। यहां का घुत्तू कस्बा बेहद खूबसूरत है। घुत्तू से एक पैदल मार्ग पंवालीकांठा बुग्याल के लिए जाता है और दूसरा मार्ग भिलंगना घाटी में स्थित देश के अंतिम गांव गंगी के लिए निकलता है। प्राचीन समय में जब सडकें नहीं थी तब गंगोत्री से पैदल सफर कर घुत्तू होते हुए केदारनाथ की यात्रा की जाती थी। उस दौर में घुत्तू पैदल यात्रा का केन्द्र बिन्दु हुआ करता था। घुत्तू से करीब दस किमी कच्ची सड़क से सफर करने के बाद रीह तोक पडता है। रीह तोक भी गंगी गांव का ही हिस्सा है। यहां से करीब दस किमी पैदल सफर कर गंगी गांव पहुचा जाता है। समुद्रतल से करीब 2700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगी को प्रकृति ने अनमोल खजाने से नवाजा है।

पैसे के बावजूद पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ गया गंगी 

गंगी गांव सहूकारी, खेती और पशुपालन के लिए जाना जात है। पूरी भिलंगना घाटी में गंगी ही ऐसा गांव है, जहां सबसे अधिक खेती योग्य जमीन है। गांव की अधिकतर महिलाएं और पुरुष अपढ़ हैं। नौनिहालों के लिए गांव में स्कूल तो है, लेकिन केवल खानापूर्ति के लिए ही बच्चे स्कूल जाते हैं। गंगी में पढा रहे शिक्षक अजय पाल सिंह कहते है कि साक्षरता की दर यहां काफी कम है। गांव की आबादी इस समय 700 से अधिक है और करीब 140 परिवार इस गांव में रहते हैं। प्रत्येक घर में आपकों बड़ी संख्या में भेड़, बकरी, गाय और भैंसें दिख जाएंगी।

गंगी में भी नोटबंदी इफेक्ट 

8 नवम्बर को अचानक जब नोटबंदी का एलान पीएम मोदी ने किया तो इस गांव में जैसे हड़कंप मच गया। आनन-फानन में ग्रामीणों ने अपनी मेहनत की कमाई को घुत्तू स्थित बैंक में जमा कराना शुरू किया। नोटबंदी के बाद अमीर से लेकर गरीब सब परेशान हैं। गंगी गांव के राम सिंह, प्रेम सिंह और बचन सिंह रावत कहते है कि गंगी से 20 किमी दूर धुत्तू जाकर केवल 2 हजार उन्हें मिल रहे हैं। सर्दियों का मौसम है और खाने पीने की चीजें पहले से रखनी पड़ती हैं, क्योंकि बर्फबारी होने के बाद हालात काफी मुश्किल हो जाते हैं।

लाेकल माइक्रो फाइनेंसिंग

दरअसल पशुपालन और खेती ने यहां के लोगों को आत्मनिर्भर बनाया है। बाजारवाद से दूर प्रकृति की गोद में रहने के कारण यहां स्थानीय लोगों का जीने का खर्च काफी कम होता है। यही वजह है कि स्थानीय लोगों के पास बचत में थोड़ा पैसा जमा होता रहा है। इसी पैसे को केदारघाटी और गंगी घाटी के लोगों को गंगी के लोग ब्याज पर देते रहे हैं।

यहां के किसी भी व्यक्ति को अगर अचानक पैसे की जरूरत पड़ जाए तो लोगों को गंगी गांव की याद आती है। क्योंकि सोमेश्वर भगवान लेने-देने में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं तो देर सबेर पैसा वापस भी आ ही जाता है। स्थानीय स्तर पर गंगी एक तरह से माइक्रो फाइनेंसिंग की भूमिका निभाता आ रहा है।

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